अलीगढ़। उर्दू शायरी में मीलों सफर तय करके करोड़ों दिलों में बस चुके शहरयार आखिरी दिनों में तन्हा थे। ये तन्हाई बीमारी से आई थी या अपनों के दूर जाने की वजह से, कुछ साफ नहीं। बड़ा बेटा हुमायूं शहरयार। दुबई में उनका इनवेस्टमेंट का कारोबार है। बेटी हैं सायमां शहरयार। वो डॉक्टर हैं, दामाद भी डॉक्टर हैं। बड़े बेटे की पत्नी जर्मन हैं। गोल्फ की चैंपियन। बेटा भी हॉकी खिलाड़ी रहा है। वहीं अफेयर हुआ और फिर निकाह। छोटा बेटा फरीदूं शहरयार टीवी डायरेक्टर है।
शहरयार से वैचारिक मतभेद होने के बाद पत्नी प्रो. नजमा दिल्ली में रह रही थीं। वो भी साहित्यकार हैं और कई किताबें लिख चुकी हैं। शहरयार अकेले होकर भी दोस्ती के दायरे को बड़े सधे अंदाज में बढ़ाते थे। सुबह कुछ दोस्तों के साथ गपशप, दोपहर को लौटना। खाना खाने के बाद चार बजे सो जाना। शाम को फिर मिलना-जुलना और अलीगढ़ क्लब में नियमित रूप से जाना। यहां एक ही दोस्त के साथ बैठते थे। जो लोग उनके करीब नहीं पहुंच पाए, वो उन्हें गुरूरवाला ही समझते रहे। बीमार पड़े तो तमाम दोस्त आते रहे। उनकी गजलें, नज्मों पर शोध करने वाले छात्र भी उनसे मिलने-जुलने आते। वे मिलते हर किसी से थे। बीमारी के दिनों में कभी बड़ा बेटा यहां होता तो कभी छोटा। कथाकार डॉ. प्रेमकुमार ने एक रोज छेड़ा, बीमारी में सबसे ज्यादा कौन याद आया? कुछ देर की चुप्पी के बाद सपाट अंदाज में जवाब दिया, 'ज्यादा व्यादा क्या? कभी कोई, कभी कोई..' वो जान चुके थे कि सवाल क्यों फेंका गया है। डॉ. कुमार पीछे पड़ गए तो चौकन्ने होकर बोले, '.मेरा बेटा कह रहा था कि वो पूछती हैं अब्बा कि आप बात करेंगे..। मैंने कह दिया..मैं नहीं..।' इतना कहने के बाद उनकी सांस फूलने-सी लगी थी। चेहरे पर पीड़ा के भाव थे।
अकेलेपन की बेबसी उनकी शायरी में भी दिखती है..
कोई नहीं जो हमसे इतना भी पूछे।
जाग रहे हो किसके लिए, क्यों सोये नहीं।
दुख है अकेलेपन का, मगर ये नाज भी है।
भीड़ में अब तक इंसानों की खोये नहीं।
शहरयार के सीने में बहुत दर्द था, लेकिन चेहरे पर कभी शिकन नहीं दिखी। वे लिखते हैं-
छाये हुए थे बादल, लेकिन बरसे नहीं।
दर्द बहुत था दिल में मगर हम रोए नहीं।'
'..अच्छी बातों को लोग देर से मानते हैं'
-'ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है, हदे निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है..' उमराव जान के इस गीत की कालर ट्यून अब शायरी के शहजादे शहरयार के मोबाइल पर नहीं सुनाई देगी।
कुंवर अखलाक मुहम्मद खान 'शहरयार' को अपनी 'पापुलर' पहचान से गुरेज नहीं था। 'दैनिक जागरण' से बातचीत में उन्होंने कहा था, 'यह दुख की बात है कि हमने पापुलर चीजों को मामूली समझ रखा है।' उन्होंने उन लोगों को भी जवाब दिया था जो सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथों उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार को वाजिब नहीं मानते। बकौल शहरयार, फिल्मी हस्ती के आने से पुरस्कार की गंभीरता कम नहीं होती।
शहरयार के मुताबिक, 'ऐसे लोग तो पॉलीटिशियंस के भी खिलाफ हैं। यह तो कोई वजह नहीं हुई। अमिताभ ने आज जो मुकाम हासिल किया है, उसके पीछे उनकी मेहनत है। मैं खुश हूं कि आर्ट की एक महान हस्ती के हाथों पुरस्कार दिया जा रहा है।'
शहरयार का शाब्दिक अर्थ होता है, शहजादा। हकीकत यह है कि उर्दू शायरी की दुनिया में गालिब, फिराक और फैज जैसे दिग्गजों के साथ खड़े शहरयार वाकई शायरी की दुनिया के शहजादे हैं। साहित्य की दुनिया से बावस्ता लोग उन्हें भले ही उनकी शायरी के लिए जानें, लेकिन आमजन के लिए वह 'उमराव जान' के बेहतरीन गीतों के रचनाकार हैं। इसके बावजूद उन्होंने फिल्मों में लगातार क्यों नहीं लिखा? इस पर उनका जवाब था, 'मेरे पास मौके थे, लेकिन अगर मैं पूरी जिंदगी फिल्मी गीतों को ऑफर कर देता, तो शायद बहुत खराब काम करता। तब लोगों की मेरे बारे में राय दूसरी होती।'
शहरयार का मानना था, 'फिल्मों में फुलटाइम काम करने का मतलब है कि आपके पास कोई च्वाइस नहीं रहती। मुंबई में कम पैसों में जिंदा नहीं रहा जा सकता। उसके लिए फिर आपको दूसरों के इशारे पर काम करना पड़ता।' फिल्मों से जिस तरह उन्होंने संतुलित दूरी रखी, वैसी ही मुशायरों से भी। शहरयार मानते थे कि फिल्मों की तरह मुशायरे भी शायरी को दूर तक पहुंचाते हैं, लेकिन 'इधर मुशायरों का जो कैरेक्टर हो गया है, उसमें मैं खुद को फिट नहीं पाता। हम जो नहीं कर सकते, उसे जान लें तो बहुत जल्दी पहचान सकेंगे कि हम क्या कर सकते हैं।'
शहरयार ने लिखा है :
जमीं ने हम को बहुत देर से कबूल किया
जले हरूफ में यह बात लिखे जाते हैं।
क्या उन्हें वाकई शिकायत थी? 'ऐसा कतई नहीं है। हां, इतना जरूर है कि अच्छी बातों को लोग जरा देर से मानते हैं।'
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उनका कहा कंवल के पत्तो पर गिरी बूंद की तरह देर तक थिरकता रहता है। शेर सुन कर देर तक कान में गूंजता है। वो घटा की तरह उमड़ कर नहीं आते। उठ कर खिड़की खोलो तो पता चलता है कि बाहर बारिश हो रही है..।
-गीतकार गुलजार
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उमरावजान के दर्द का एहसास था शहरयार को
-हिंदी सिनेमा में मील की पत्थर बनी 'उमरावजान' के सदाबहार गीतों को लिखकर 'अमर' हुए शहरयार ने तवायफों की जिंदगी को बहुत करीब से देखा था। शायद इसी वजह से वे इतने अच्छे तरीके से गानों को लिख पाए। शहरयार से जब भी उमरावजान के बारे में सवाल हुए, उनके चेहरे पर अजीब सा संकोच, चेहरा खिला-खिला, खूबसूरत-सा गर्व झलकने लगता।
वे बताते, 'मेरे वालिद साहब की पोस्टिंग बहेड़ी [बरेली] में थी। उस वक्त मेरी उम्र सात-आठ साल रही होगी। थाने के बिलकुल बराबर तवायफों के मकान थे। वालिद साहब सरकारी काम से बाहर जाते तो मैं घूमता-फिरता वहां पहुंच जाता। तवायफें दरोगाजी का बेटा होने की वजह से मेरी बड़ी खातिर-तवज्जो करतीं। फिर मेरे वालिद साहब थाने में हर साल तवायफों का एक बहुत बड़ा मुजरा कराया करते थे। मेरे दोनों बड़े भाइयों की शादी हुई तो उसमें मशहूर तवायफें आईं।
जाहिर है कि दस-बारह साल मैंने उमरावजान नॉविल को बतौर उस्ताद पढ़ाया भी है।' वे फिल्म की इतनी पापुलरिटी का क्रेडिट अपने जिगरी दोस्त मुजफ्फर अली को देते। वे बताते भी, 'इस फिल्म के गाने से तवायफ की जिंदगी शुरू होती है और आखिर तक आते-आते सम-अप।' शहरयार एक और वाकया सुनाते थे, 'आखिरी गाने के मुखड़े..गुबार ही गुबार है..को खय्याम साहब बदलने पर आमादा थे। वे कहते थे कि ये तो धूल उड़ रही है मुखड़े में ही। .पर मुजफ्फर अली ने कहा कि आप बिलकुल एग्री मत करिएगा। उनकी ये चीज मुझे बहुत पसंद आई।
आखिर में खय्याम भी मान गए।' मुजफ्फर अली ने शहरयार से एक और फिल्म के लिए गाने लिखवाए थे, लेकिन ये पूरी नहीं हो पाई।
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