नई दिल्ली। भारत-अमेरिका परमाणु करार पर अमल की दिशा में एक भी कदम आगे बढ़ाने के खिलाफ मनमोहन सरकार को घुड़की दी है। माकपा ने कहा है कि देश की संप्रभुता तथा विदेश नीति की स्वतंत्रता की कीमत पर ऐसा कोई समझौता वामपंथी दलों को कतई स्वीकार्य नहीं है।
माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य एवं राज्यसभा में पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने भारत पर अमेरिकी हाइड कानून का कोई असर नहीं होने के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के दावे को खारिज करते हुए यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में करार पर अमल की दिशा में कदम बढ़ाने की स्थिति में सरकार से समर्थन वापसी की परोक्ष चेतावनी भी दी। उन्होंने यह तो नहीं कहा कि ऐसे में वामपंथी पार्टियां कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [संप्रग] सरकार से समर्थन वापस ले लेंगी। लेकिन वाम दलों का रुख दोहराते हुए एक प्रश्न पर कहा कि तब हम सरकार का समर्थन नहीं कर सकते और जोड़ा कि अक्लमंद को इशारा ही काफी है।
इस बीच करार तथा विदेश नीति संबंधी अन्य मुद्दों पर संसद के दोनों सदनों में मुखर्जी के बयान के बाद आज माकपा के शीर्ष सांगठनिक निकाय [केंद्रीय समिति] ने भी एक सख्त बयान जारी कर सरकार से करार पर संसद की भावना, वाम दलों के साथ सहमति तथा देश को संसद के जरिए दिए गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वचन का पूरा ध्यान रखने को कहा है। भारत पर हाइड कानून का कोई असर नहीं होने के मुखर्जी के दावे को खारिज करते हुये केंद्रीय समिति ने अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस के गत 14 फरवरी के उस आश्वासन का हवाला भी दिया है कि अमेरिका परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह [एनएसजी] में भारत की पैरवी हाइड एक्ट की शर्र्तो के पूर्ण अनुपालन को ध्यान में रखकर ही करेगा।
येचुरी ने कहा कि यह ठीक है कि हाइड कानून भारत के साथ असैनिक परमाणु सहयोग करार के लिए अमेरिका को संबद्ध कानून की धारा 123 से छूट देने का प्रावधान भर है। लेकिन यह भी सच है कि इस छूट के लिए हाइड कानून में भारतीय विदेश नीति को अमेरिकी हितों के अनुकूल मोड़ने, देश की संप्रभुता को गिरवी बनाने, भारत को अमेरिकी रक्षा परियोजनाओं में कनिष्ठ साझीदार बनाने जैसी अनेक अस्वीकार्य शर्ते भी प्रस्तावित हैं।
उन्होंने एक सवाल पर कहा कि अगर 123 से छूट बिना शर्त होती तो माकपा तथा अन्य वामदलों को इस पर एतराज नहीं होता। रूस तथा कुछ अन्य देशों से परमाणु समझौते के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि कि वहां ये शर्र्ते नहीं हैं।
माकपा नेता ने कहा कि विदेश मंत्री के वक्तव्य में परमाणु करार के संबंध में सरकार का पूर्वज्ञात रुख ही दुहराया गया है और संप्रग सरकार इस बारे में समर्थक वाम दलों की राय से भी पूरी तरह वाकिफ हैं। उन्होंने कहा कि वाम दलों का रुख पूर्ववत है और हम करार पर अमल की दिशा में आगे कदम बढ़ाए जाने की स्थिति में सरकार का समर्थन नहीं कर सकते।
येचुरी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश जल्द ही लेम डक राष्ट्रपति हो जाएंगे। लिहाजा, संप्रग सरकार को किसी भी जल्दबाजी में नहीं पड़ना चाहिए और वहां राष्ट्रपति चुनावों के बाद नए अमेरिकी प्रशासन के रुख का खुलासा होने का इंतजार करना चाहिए।
उन्होंने सरकार को परमाणु करार पर वाम दलों के साथ बनी समिति में हुए [लिखित समझौते] की याद भी दिलाई और कहा कि समझौते के तहत सरकार को भारत केंद्रित परमाणु सुरक्षा उपायों पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी [आईएईए] से वार्ता की इजाजत दी गई है। सुरक्षा उपायों के प्रारूप पर आरंभिक सहमति व्यक्त करने से पहले सरकार को यह प्रारूप समिति के समक्ष अनुमोदन के लिए रखना है।
माकपा नेता ने एक प्रश्न पर बताया कि आईएईए से वार्ता के छह दौर हो चुके हैं और एक सप्ताह में सरकार यह प्रारूप संप्रग वाम समिति में रख सकती है। उन्होंने आम बजट में किसानों को ऋण के बोझ से मुक्ति दिलाने के लिए 60000 करोड़ रुपये का प्रावधान करने की चर्चा करते हुए सरकार को इससे प्रभावित होने वाले सहकारी बैंकों एवं संस्थाओं की अच्छी सेहत सुनिश्चित करने के ठोस उपाय करने का सुझाव भी दिया।