
नई दिल्ली। बेतहाशा महंगाई के इस दौर में आप अब पेट्रोलियम उत्पादों की मूल्य वृद्धि के झटके को सहने के लिए तैयार हो जाइए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बृहस्पतिवार को इस बात के साफ संकेत दे दिए कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों को बढ़ाने के विकल्प टटोल रही है।
यूपीए सरकार के चार वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिए गए रात्रिभोज में पत्रकारों के साथ अनौपचारिक बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा कि तेल कंपनियों पर अब और ज्यादा बोझ नहीं पड़ने दिया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के 136 डालर प्रति बैरल चले जाने के बाद उत्पन्न स्थिति पर विचार करने के लिए शुक्रवार को प्रधानमंत्री की पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा के साथ बैठक भी संभावित है। इस बैठक से पहले देवड़ा ने सरकारी क्षेत्र की तीनों तेल कंपनियों इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के आला अधिकारियों को विचार-विमर्श करने के लिए बुलाया है। इस बैठक में पेट्रोलियम मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी होंगे। इसमें खास तौर पर यह फैसला किया जाएगा कि प्रधानमंत्री से कितनी मूल्य वृद्धि का अनुरोध किया जाए। मूल्य वृद्धि के अलावा तेल बांड्स और शुल्कों में कटौती का भी प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
सूत्र बताते हैं कि स्थिति अब ऐसी नहीं है कि एक-दो रुपये की मूल्य वृद्धि से काम चल जाए। सरकार को कोई ठोस कदम उठाना ही होगा। तेल कंपनियों को रोजाना लगभग छह सौ करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक तीनों तेल कंपनियों ने सरकार को त्राहिमाम संदेश भेजा है कि अब उनके लिए मौजूदा परिस्थितियों में काम करना पूरी तरह से असंभव हो गया है। तेल कंपनियों ने यह संकेत भी दिया है कि उनके लिए अब पेट्रोल पंप बंद करने का रास्ता ही दिखाई दे रहा है।
सूत्रों के मुताबिक देवड़ा प्रधानमंत्री को यह समझाने की कोशिश करेंगे कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की किल्लत या राशनिंग से बेहतर होगा कि अब मूल्य वृद्धि कर दें। प्रधानमंत्री को यह भी बताया जाएगा कि किस तरह से तेल कंपनियों के तमाम प्रयासों के बावजूद मूल्य वृद्धि से औद्योगिक असमानता पैदा हो रही है। देश के कई हिस्सों में सब्सिडी प्राप्त पेट्रोल और डीजल का गलत उपयोग किया जा रहा है।
कच्चे तेल के मौजूदा दर पर रहने से तेल कंपनियों को दो लाख करोड़ रुपये का घाटा होने की संभावना है। अगर ऐसा हुआ तो इसकी भरपाई आयल बांड्स के जरिये भी नहीं हो सकेगी और न ही करों में कटौती के जरिए। इसलिए सरकार को मूल्य वृद्धि की कड़वी गोली अभी ही खानी होगी।
हालांकि यह फैसला करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। एक तरफ तो वह महंगाई के मोर्चे पर लड़ रही है। पेट्रो उत्पादों की खुदरा कीमतों में वृद्धि से महंगाई की आग और भड़क सकती है। दूसरी तरफ यूपीए सरकार के कार्यकाल का यह अंतिम वर्ष भी है। सरकार अंदरखाने में ही चुनाव की तैयारियों में जुटी है। ऐसे में देखना होगा कि वह किस हद तक मूल्य वद्धि के लिए तैयार होती है।