जमीन हस्तांतरण पर सहमत थे पीडीपी नेता

 
Jul 07, 10:05 pm

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 100 एकड़ वन भूमि हस्तांतरण के विरोध में आजाद सरकार से समर्थन वापस लेने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी [पीडीपी] के उप मुख्यमंत्री मुजफ्फर हसन बेग और वन मंत्री काजी अफजल ने फैसले पर सहमति की मुहर लगाई थी।

कैबिनेट में इस संबंध में सर्वसम्ममति से फैसले के बाद ही जमीन का हस्तांतरण हुआ। जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा ने यह खुलासा किया है। उन्होंने निर्वतमान मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद की तारीफ करते हुए उन्हें राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत व्यक्ति बताया है।

लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा कि अगर राज्यपाल खुद ही ऐसा फैसला करने में सक्षम होता तो मामला तीन साल से लंबित नहीं होता। इस संबंध में बेग और काजी को सब मालूम था और वह इसके हक में थे। सुप्रीमकोर्ट की अधिकार प्राप्त समिति से इस पर राय भी ली गई थी। जब इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंगत दी गई और मामला भड़क गया तो पीडीपी ने पाला बदल लिया।

पीडीपी को 'हैरान' करने वाला राजनीतिक दल बताते हुए उन्होंने कहा कि यह हीलिंग टच के नाम पर आतंकियों के परिवारों की परवरिश करते हैं। कश्मीर पर भारत-पाक के संयुक्त नियंत्रण की बात करते हैं और इनके नेता पाकिस्तानी करंसी की माला पहनते हैं। उन्होंने कहा कि वह राज्य में कश्मीरियत को बढ़ावा दे रहे थे जिससे कंट्टरवादी परेशान होने लगे थे। पहले उन्होंने और कई बहानों से सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने की कोशिश की। जब वे कामयाब नहीं हुए तो अमरनाथ बोर्ड को जमीन हस्तांतरण को मुद्दा बना लिया।

लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ने कहा कि जब 1000 एकड़ वन भूमि रिलायंस को दी जा सकती है। इसके अलावा पीडब्लूडी, बिजली और संचार विभाग को जमीन दी जा सकती है तो अमरनाथ यात्रियों के लिए ऐसा क्यों नहीं? वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड को भी तो वन भूमि दी गई है। क्या जम्मू राज्य का हिस्सा नहीं है?

पूरे प्रकरण के लिए कांग्रेस द्वारा उन पर जिम्मेदारी मढ़ दिए जाने से आहत लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ने कहा कि उन्हें एक जिम्मेदार पार्टी से ऐसे रवैये की उम्मीद नहीं थी। वह न तो किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं और न ही सांप्रदायिक हैं। बल्कि इस सोच के साथ आगे बढ़ रहे थे कि कश्मीर में माहौल अच्छा बनाने के लिए कंट्टरपन के खिलाफ कश्मीरियत को बढ़ावा देना होगा।

पूर्व राज्यपाल ने कहा कि अगर जमीन हस्तांतरण का फैसला वापस भी लेना था तो सम्मानित तरीका अपनाया जा सकता था। कह देते कि यात्रियों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया था पर कुछ लोगों की भावनाओं के आहत होने की वजह से इसे वापस लिया जाता है। लेकिन श्राइन बोर्ड को ही पंगु बनाने की कोशिश हो रही हैं जो कि गलत हैं।




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