
नई दिल्ली [संजय मिश्र]। आईएईए में जाने की प्रधानमंत्री की दो टूक घोषणा के बाद वामदलों की समर्थन वापसी को तय मान कर संप्रग सरकार लोकसभा में बहुमत जुटाने के इंतजाम में लग गई है। सरकार के रणनीतिकार बहुमत साबित करने के लिए लोकसभा का विशेष सत्र बुलाने की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं। इसे देखते हुए कांग्रेस व सरकार के संकटमोचकों ने अन्य छोटे दलों व निर्दलीय सांसदों को अपने पाले में लाने की पेशबंदी शुरू कर दी है।
कांग्रेस के रणनीतिकार अब मान चुके हैं कि प्रधानमंत्री की दो टूक घोषणा के बाद वामदल न केवल सरकार से समर्थन वापस लेंगे बल्कि आईएईए में जाने से पहले सरकार पर लोकसभा में बहुमत साबित करने के लिए दबाव बनाएंगे। यदि वामदल समर्थन वापसी का पत्र देकर बहुमत परीक्षण की मांग पर जोर देते हैं तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल प्रधानमंत्री को विश्वासमत लेने का निर्देश दे सकती हैं। इसके लिए सरकार को हफ्ते भर का समय दिया जा सकता है।
वैसे एक तर्क यह भी है कि राष्ट्रपति के पास सरकार का समर्थन करने वाले दलों की सूची है। ऐसे में वह वामदलों के निर्णय के बाद सरकार के बहुमत की स्थिति का आकलन कर सकती हैं। तब विशेष सत्र की संभावना खत्म हो सकती है लेकिन माना जा रहा है कि विवाद से बचने के लिए राष्ट्रपति भवन सदन के भीतर शक्ति परीक्षण को तरजीह देगा। इसलिए कांग्रेस की तरफ से तैयारियां शुरू हो गई हैं।
संप्रग के सांसदों की संख्या 225 है। समाजवादी पार्टी के 39, जद सेक्युलर के तीन, रालोद के तीन तथा आधा दर्जन निर्दलीय सांसदों को मिलाकर यह आंकड़ा 275 को पार कर जाता है। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 की संख्या जरूरी है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का दावा था कि संप्रग का आंकड़ा 280 से अधिक है। इसके अलावा पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस सहित कुछ अन्य दलों से रणनीतिक समर्थन की उम्मीद भी है।
फिर भी सरकार के पक्ष और विपक्ष में सांसदों की संख्या में काफी कम अंतर को देखते हुए पार्टी के प्रबंधक बेहद सचेत हैं। इसलिए सपा के कुछ सांसदों पर बसपा प्रमुख मायावती के डोरे डालने की अटकलों को लेकर पार्टी में थोड़ी बेचैनी भी है। हालांकि एक वरिष्ठ मंत्री ने साफ कहा कि 'लेफ्ट' के 'आउट' होने के बाद भी बहुमत का आंकड़ा सरकार के पक्ष में है।