नई दिल्ली [टी. ब्रजेश]। करार और सरकार के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर चुकी माकपा इस बात से कतई फिक्रमंद नहीं है कि इस मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होने पर उसके मुस्लिम वोट बैंक का नुकसान होगा। पार्टी की केंद्रीय समिति ने विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ भाजपा के साथ वामदलों के वोट देने के पोलित ब्यूरो के फैसले पर मुहर लगा दी है। पार्टी की शीर्ष संस्था ने लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का मामला भी पोलित ब्यूरो पर छोड़ने के संकेत दिए हैं।
शनिवार से दिल्ली में शुरू हुई माकपा केंद्रीय समिति की दो दिवसीय बैठक में साफ कर दिया गया कि परमाणु करार रोकने के लिए 'राजनीतिक तौर पर जो बन सकता है किया जाना चाहिए।' लिहाजा भाजपा के साथ मतदान में वामदलों के हिस्सा लेने पर पश्चिम बंगाल माकपा में उभरे मतभेदों को केंद्रीय समिति ने दरकिनार कर दिया। आज दिन भर चली मंत्रणा के बाद केंद्रीय समिति ने सरकार गिराने के लिए माकपा महासचिव प्रकाश करात को सारे 'पंथनिरपेक्ष' दलों से तालमेल बिठाने के लिए हरी झंडी भी दे दी।
केंद्रीय समिति में सोमनाथ के मसले पर भी गरमागरम बहस हुई। वरिष्ठ कामरेडों में से कुछ ने उनके समर्थन में तो कुछ ने उनके विरोध में अपनी-अपनी राय व्यक्त की। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय समिति सोमनाथ के पद पर बने रहने से जुड़े पूरे विवाद पर फैसला करने के लिए पोलित ब्यूरो को ही अधिकार देने के मूड में है।
सदन में सरकार के बच जाने को लेकर कांग्रेस प्रबंधकों के दावों के बीच माकपा की शीर्ष संस्था ने कामरेडों को नवंबर-दिसंबर में चुनाव के लिए तैयार रहने को भी कहा। इस लिहाज से चुनावी रणनीति पर भी जमकर चर्चा हुई। इस संदर्भ में वाम दलों और बसपा में नए संबंध को लेकर भी चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार करात ने केंद्रीय समिति को जानकारी दी कि फिलहाल यह सिर्फ विश्वास मत तक ही सीमित है। आगे इसे क्या मोड़ देना है इसका फैसला आगे की बैठकों में किया जाएगा।
माकपा नेतृत्व का मानना है कि 22 जुलाई को संप्रग के विश्वास प्रस्ताव की नैया भले पार लग जाए लेकिन आने वाले दिनों में सरकार की मुश्किल बढ़ेंगी। ऐसे कई विधेयक लंबित हैं जिस पर वोट की नौबत बार-बार आएगी और सरकार कहां तक बहुमत जुटाने के लिए मशक्कत करती रहेगी।
केंद्रीय समिति में चर्चा का दौर करात की रिपोर्ट के आधार पर शुरू हुआ। पोलित ब्यूरो की तरफ से इस रिपोर्ट में करात ने सरकार से समर्थन वापस लेने और उसके बाद पैदा हुए ताजा राजनीतिक हालात का लेखा-जोखा पेश किया। करात की कोशिश यह साबित करने की रही कि उनके इस फैसले की वजह से न तो वामदलों की किरकिरी हुई और न ही माकपा कहीं भी अलग थलग पड़ी। करार के खिलाफ सरकार के हाथ से एक-एक सांसदों के फिसलते जाने का उदाहरण देकर उन्होंने अपना दावा पुख्ता किया।