
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह [एनएसजी] की छूट लेने में जितने पापड़ बेलने पड़े हैं लगभग उतनी ही मुश्किल अमेरिका को अपने यहां कांग्रेस से इस करार को मंजूर कराने में होगी।
वाशिंगटन में गोपनीय दस्तावेज के खुलासे के बाद परमाणु अप्रसार के समर्थक सांसद राष्ट्रपति जार्ज बुश से दो टूक जवाब मांगने के लिए कमर कसकर बैठे हैं। अमेरिकी कांग्रेस का आखिरी सत्र इसी माह के अंत में खत्म हो रहा है, जो अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव से पहले का अंतिम सत्र है।
जाहिर है कि बुश के लिए चुनौती एनएसजी से कम कठिन नहीं है। एनएसजी से मंजूरी के बाद अब जार्ज बुश यह कभी नहीं चाहेंगे कि भारत अमेरिका परमाणु आखिरी मोर्चे पर जाकर अटक जाए। यह स्वयं उनके और अमेरिका की प्रतिष्ठा को गहरा झटका होगा।
संकेत हैं कि बुश के रणनीतिकार एनएसजी से भारत को मिली छूट के सहारे ही एटमी करार विरोधी लाबी पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे। सूत्रों के मुताबिक करार का रास्ता साफ करने में अहम भूमिका निभाने वाली विदेश विभाग की मुखिया कोंडोलीजा राइस की देखरेख में बुश प्रशासन की इस रणनीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
प्रेक्षकों का मानना है कि संधि के व्यापारिक पहलू को आजमाते हुए बुश प्रशासन सीनेटरों को सीधे-सीधे समझाने की कोशिश करेगा। वह बताएगा कि एनएसजी से भारत को नाभिकीय कारोबार के लिए छूट मिल जाने के बाद वह फ्रांस, रूस और आस्ट्रेलिया जैसे किसी भी परमाणु ऊर्जा के धनी देश के साथ व्यापारिक रिश्ते बना लेगा। अमेरिका मुंह देखता ही रह जाएगा।
करार के हाथ से निकल जाने की वजह से वाशिंगटन को होने वाले आर्थिक नुकसान के हिसाब-किताब को भी तैयार कर लिया गया है। इसे करार विरोधी सीनेटरों के सामने पेश किया जा सकता है। जानकारों की मानें तो मौजूदा नाभिकीय करार से परमाणु संयंत्रों का व्यवसाय करने वाले देशों के लिए करीब 150 अरब डालर के कारोबार के अवसर तात्कालिक तौर पर पैदा होंगे। इस कारोबार में वित्तीय सहायता देकर अमेरिकी बैंक काफी मुनाफा कमा सकते हैं। बुश के रणनीतिकारों को भरोसा है कि करार के आर्थिक हितों का यह तर्क सीनेटरों के तर्को पर भारी पड़ेगा।
परमाणु हथियारों की होड़ को लेकर सांसदों के सवालों के जवाब तैयार करने में भी बुश प्रशासन के प्रबंधक जी जान से लगे हुए हैं। इन सीनेटरों को चुप कराने के लिए बुश 123 समझौते में 'स्वैच्छिक पाबंदी' को लेकर भारत की तरफ से जताई गई प्रतिबद्धता का सहारा लेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति उन्हें बताएंगे कि 'स्वैच्छिक प्रतिबंध' भी परमाणु परीक्षण रोकने के लिए कितना प्रभावी होता है। नाभिकीय क्षेत्र में स्व-अनुशासित रहने का भारत का रिकार्ड भी बुश के तर्को की बुनियाद बनेगा।
करार को कांग्रेस से मंजूर कराने में समय प्रबंधन का भी एक पहलू है जिस पर बुश के रणनीतिकार जोर-शोर से लगे हुए हैं। उनकी कोशिश होगी कि करार को कांग्रेस में पेश किए जाने का समय कुछ इस तरह चुना जाए कि सीनेटरों को इस पर बहस का बहुत ज्यादा वक्त न मिले। आनन-फानन में इसे पारित करा लिया जाए।
गौरतलब है कि चुनावी व्यस्तता की वजह से सीनेटर कांग्रेस के सत्र में ज्यादा समय देने के हक में नहीं रहेंगे। हो सकता है कि उनकी जल्दबाजी का फायदा उठाने में बुश प्रशासन कामयाब हो जाए।