..जिनके पास थी हर दांव की काट

 
Sep 06, 09:15 pm

नई दिल्ली [संजय मिश्र]। एन, एम, के, एस.. यानी नारायणन, मेनन, काकोदकर और श्याम सरन..। राजनयिकों और विशेषज्ञों का यह चौगुट भारत के लिए एनएसजी में डील मेकर बनकर उभरा है। भारत में करार विरोधी नेताओं को समझाने से लेकर अमेरिका के चतुर सीनेटरों को जवाब देने तक में इनकी महती भूमिका रही।

आईएईए में भारत के लिए राह आसान करने से लेकर एनएसजी में जबर्दस्त दबाव के बीच करार को अंजाम तक पहुंचाने में इस चौगुट ने केंद्रीय भूमिका निभाई।

परमाणु करार पर सक्रिय काम शुरू होने के बाद इस डील को अंजाम तक पहुंचाने की कमान इन्हीं चार अनुभवी अधिकारियों यानी परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर, पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, विदेश सचिव शिवशंकर मेनन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के हाथ रही। इनमें किसी ने ड्राफ्ट बनाने और दस्तावेजी लिखा पढ़ी में अपना हुनर दिखाया तो किसी ने मौजूं बयान देकर माहौल को अपने हक में किया। कोई पर्दे के पीछे कूटनीतिक सूत्र संभालने और रूठों को मनाने में जुटा रहा। इन चार के अलावा अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन और भारत में अमेरिका के राजदूत डेविड मलफोर्ड ने नाजुक मौकों पर अपनी बेजोड़ कूटनीतिक दक्षता दिखाई है।

भारत की नाभिकीय उम्मीदों पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने की पूरी मुहिम विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के इर्द गिर्द घूमती रही है। मामला चाहे दुनिया भर में जाकर भारत के आक्रामक राजनयिक अभियान के संचालन करने का हो या फिर परमाणु तकनीक के मामले में भारत की साफ सुथरी छवि को दुनिया के सामने रखने का। मेनन ने यह मोर्चा बखूबी संभाला।

श्याम सरन के राजनयिक अनुभवों और मसौदे तैयार करने की काबिलियत को देखते हुए प्रधानमंत्री ने विदेश सचिव से रिटायर होने के अगले ही दिन उन्हें परमाणु करार के लिए विशेष दूत नियुक्त कर दिया था। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय करार के राजनयिक पहलुओं की पूरी व्यूह-रचना उन्होंने ही की। इतना ही नहीं, विश्व जनमत को करार पर राजी कराने की कोर टीम के वह अहम किरदार रहे।

अमेरिका-भारत 123 समझौते के मसौदे में भारत के तकनीकी व सामरिक हित अधिकतम सुरक्षित रखने में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर की प्रमुख भूमिका रही। आईएईए के साथ भारत का एडिशनल प्रोटोकाल भी पूरी तरह इनकी मेहनत का नतीजा था। जानकार कहते हैं, आईएईए बैठक में भारत के वार्ताकार के रूप में काकोदकर रणनीति ने भारत के लिए यह मोर्चा बेहद आसान कर दिया। आईएईए के 35 सदस्य देशों में से 26 एनएसजी के भी सदस्य हैं। इसमें से करीब 15 देश समझौते की पैरोकारी नहीं कर रहे थे। मगर काकोदकर ने आईएईए बैठक के बाद इन देशों के लिए खास तौर से एक ब्रीफिंग कर एनएसजी की राह आसान करने की बुनियाद रखी।

देश के भीतर राजनीतिक मोर्चे पर तगड़े विरोधों को कम करने की कमान सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन हाथ रही। खासतौर से यह देखते हुए कि इस मामले में राजनीतिक दबाव इतना गहरा था कि कई मौकों पर ऐसा लगा कि डील खत्म हो सकती है।




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