
नई दिल्ली। महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने संबंधी बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित विधेयक के मौजूदा लोकसभा से पारित होने के आसार कम ही हैं क्योंकि लोकसभा का कार्यकाल कुछ ही महीनों में समाप्त होने वाला है।
महिला आरक्षण विधेयक की पड़ताल पूरी करने के लिए संसद की स्थायी समिति के कार्यकाल में तीसरा विस्तार दिये जाने से यह स्पष्ट हो चुका है।
वरिष्ठ कांग्रेसी संासद ई एम सुदर्शन नाचियप्पन की अध्यक्षता वाली समिति का कार्यकाल हाल ही में संसद के अगले सत्र तक के लिए बढ़ाया गया है जो फरवरी में शुरू होने की संभावना है। इस विधेयक को मौजूदा समिति को पिछले साल मई माह में सौंपा गया था। समिति का दूसरा कार्यकाल मानसून सत्र तक बढ़ाया गया था जो 23 दिसंबर को समाप्त हुआ।
राज्यसभा सचिवालय के अनुसार राज्यसभा के सभापति ने वर्तमान विधेयक पर अपनी रिपोर्ट देने के लिए समिति के कार्यकाल को संसद के अगले सत्र तक फिर से विस्तार दे दिया है।
संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण संसद से पारित होने के लिए इसके सामने कई तकनीकी चीजें हैं।
संविधान संशोधन विधेयक को पारित होने के लिए दो तिहाई बहुमत के अलावा राज्य विधानमंडलों के कम से कम पचास फीसदी सदस्यों का अनुमोदन भी जरूरी है।
विधेयक पर आम सहमति को तत्पर नचियप्पन ने कहा कि कमेटी कई राज्यों के दौरे पर जाकर राजनैतिक पार्टियों से व्यापक विचार विमर्श करेगी। नचियप्पन ने कहा कि सरकार इस विधेयक को आम सहमति से संसद में पेश करना चाहती है इसके लिए हम काम कर रहे हैं।
कुछ पार्टियों द्वारा कोटा के भीतर कोटा पर जोर देने के कारण विधेयक ंका हुआ है और कमेटी को विश्वास है कि इस पर आम सहमति बन जाएगी।
समाजवादी पार्टी जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विवादास्पद विधेयक के वर्तमान स्वरुप पर उत्पन्न ठहराव को खत्म करने के लिए कमेटी ने सुझाव दिया है कि लोकसभा में महिलाओं और अन्य पिछड़ा वर्गो को समुचित प्रतिनिधित्व निर्धारण करने का फैसला राज्य की विधायिकाओं पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इस मेलमिलाप वाले फार्मूला के पीछे कारण यह है कि राज्य विधायिकाएं निर्वाचित होने वाली महिलाओं और अन्य पिछड़ा वर्गो के प्रतिनिधित्व की सीमा तय करने में बेहतर सक्षम हैं।
केंद्र में संप्रग सरकार की सहयोगी सपा इस संबंध में कोई फैसला जल्दबाजी में लेने के खिलाफ है जबकि एक अन्य सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल ने विधेयक का इसके वर्तमान स्वरुप में विरोध किया है।
बहरहाल भारतीय जनता पार्टी विधेयक का इसके वर्तमान स्वरुप में समर्थन कर रही है और इसने संप्रग से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।