
धोद [सुरेंद्र प्रसाद सिंह]। वह विधायक हैं। हिंदी, राजनीतिशास्त्र और इतिहास में एमए हैं। अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं। उनकी पत्नी दो बार ब्लाक प्रमुख रह चुकी हैं। लेकिन पति-पत्नी और दो बेटों का उनका छोटा परिवार निर्बल आयवर्ग के लिए बने एक कमरे के मकान में रहता है। संपत्तिके नाम पर उनके पास एक झोपड़ी और एक भैंस है। यह हैं बीपीएल कार्डधारक माकपा विधायक पेमाराम।
राजस्थान में धोद विधानसभा क्षेत्र के यह विधायक अपने वेतन और भत्तो का एक पैसा नहीं लेते। पेमाराम कांग्रेस के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष परशुराम मामोदी को हराकर चुनाव जीते थे।
धन बल और बाहुबल की सड़ांध मारती राजनीति के बीच पेमाराम जैसे लोग लोकतंत्र में हमारी आस्था बनाए रखते हैं। राजनीति को पेशा मानने वालों के लिए भले पेमाराम की गरीबी और सादगी उपहास के विषय हों, निश्चित रूप से बहुत सारे दूसरे लोगों के लिए वह प्रेरणादायी हैं। उनके दो बेटे गांव के ही स्कूल में जाते है। ब्लाक प्रमुखी के दौरान पत्नी ने कभी कोई सुविधा नहीं ली। अपना बीपीएल का लाल कार्ड लिए पेमाराम कभी भी राशन की दुकान पर गेहूं लेते देखे जा सकते हैं। लेकिन, पेमाराम के लिए उनकी यह जीवनशैली न मलाल का बायस है और न गर्व का विषय। वह तो बस हमेशा से ऐसे ही रहे।
इसीलिए माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य नीलोत्पल बसु उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। बसु के मुताबिक 'पेमाराम ने हमेशा संघर्ष किया और आदर्र्शो की लड़ाई लड़ी।' आप विधायकी का वेतन क्यों नहीं लेते और कैसे खर्च चलता है? इस सवाल को पेमाराम बहुत अहमियत नहीं देते। उनका जवाब होता है कि सौ में अस्सी लोग जब बीस रुपए रोज पर गुजारा करते हैं तो उनके लिए भी पार्टी से बतौर वेतन मिलने वाली मासिक रकम बहुत है। पेमाराम विधायकी का वेतन और भत्तो पार्टी कोष में जमा कर देते हैं।
इन दिनों पार्टी के ही एक और विधायक व सीकर लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी अमरा राम के चुनाव प्रचार में व्यस्त पेमाराम राजनीति को समाजसेवा का साधन मानते हैं, साध्य नहीं। विधायकी के अपने चुनाव में पेमाराम रोज दसियों किलोमीटर पैदल चलते थे। आस-पास के लोगों और समर्थकों ने मिलकर एक पुरानी जीप किराये पर लेने भर की रकम उन्हें चंदा करके दे दी। पेमाराम जीप पर चढ़े लेकिन चुनाव प्रचार पूरा होने पर उन्हें पता चला कि चंदे की रकम में बीस हजार रुपये बच गए हैं तो उन्हें भी वह पार्टी कोष में जमा कर आए।
पेमाराम मानते हैं कि उन जैसे साधारण पृष्ठभूमि के व्यक्ति को चुनाव जिता कर धोद के लोगों ने उन पर उपकार किया है। उनकी इच्छा इस उपकार को उतारने की है और उन्हें इसका सिर्फ एक जरिया समझ में आता है, समाजसेवा करना।