
सिरोही [अंशुमान तिवारी]। यह चौथा मोर्चा होगा या पाचवा, पता नहीं लेकिन चुनाव के बाद सरकार गठन के खेल को दिलचस्प बनाने के लिए एक नए छोटे मोर्चे की तैयारी शुरू है। ऐसा मोर्चा जो निर्दलीय और अपनी पार्टी से अकेले चुनकर आए सासदों का हो सकता है।
काग्रेस के बागी बूटा सिंह अंदरखाने इस मुहिम पर काम शुरू कर चुके है। टिकट काटे जाने से खफा बूटा जालोर से निर्दलीय ताल ठोक रहे है। बूटा के लिए यह नाक की लड़ाई है। दूसरा मौका है जब वह इसी क्षेत्र में निर्दलीय मैदान में है। माना जा रहा है राजस्थान से इस बार दो या तीन निर्दलीय संसद पहुंच सकते हैं।
बूटा सिंह संकेतों में कहते है कि चुनाव बाद हम निर्दलीय सासदों से बात करेंगे। भजनलाल भी साथ आ सकते है। वह इशारों में कह जाते है कि सरकार बनाने की कोशिश करने वाले गठबंधन को निर्दलीय सासद इस बार अपनी एकजुट ताकत का अहसास करा सकते है। वह काग्रेस में भी वापसी का दरवाजा बंद नहीं करना चाहते, इसलिए कहते है कि मैं काग्रेस से अलग हुआ हूं, काग्रेस मुझसे अलग नहीं हो सकती।
बाड़मेर, पाली, उदयपुर से घिरे और गुजरात से सटे जालोर सिरोही लोकसभा क्षेत्र में मीलों तक कुछ नहीं दिखता। कीकर और बबूल के दरख्त, अरावली की सूखी चोटियों और धूल भरे अंधड़ के बीच घटों के सफर के बाद कुछ गाव मिलते है। बूटा सिंह को हम सिरोही से पहले रेवदर में पकड़ते है। लोग यहा गुजराती मिश्रित मारवाड़ी बोलते है और गाव के छोटे से बाजार में जुटे है। बूटा सभा निपटाकर मुखातिब होते है।
उनके पास पुरानी यादें है, पार्टी की बेरुखी का दर्द है और जालोर सिरोही क्षेत्र पर पकड़ का आत्मविश्वास भी है। काग्रेस ने ऐसा क्यों किया? बूटा कहते हैं, क्या बोलूं, मैं तो महाराष्ट्र मे प्रचार कर रहा था जहा मुझे पता चला कि न मुझे जालोर से टिकट मिला और न गंगानगर से। तो क्या प्रदेश इकाई विरोध में थी? बूटा कहते है सबको मालूम है किसने क्या किया? काग्रेस के केंद्रीय नेताओं ने कहा हम प्रदेश इकाई की मानेंगे, फिर भी मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता था। लेकिन यहा के लोगों ने सार्वजनिक सम्मेलन बुलाकर मुझे प्रत्याशी बनाया। तो मैं क्या करता?
काग्रेस आप पर कार्रवाई करेगी? उनको जो करना है करे, मैंने तो जनता की आवाज सुनी। मैं काग्रेस का पुराना सिपाही हूं। काग्रेस मुझसे अलग नहीं हो सकती लेकिन कष्ट होता है। बूटा 1998 की याद करते है जब उन्हे टिकट नहीं मिला था और वह निर्दलीय लड़े थे। अगर जीते तो फिर काग्रेस में जाएंगे? बूटा सिंह कहते है अब नहीं, अब तो निर्दलीय रहकर ही राजनीति करनी है।