
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल कर सेतुसमुद्रम परियोजना के वैकल्पिक मार्ग पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की अर्जी पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया।
स्वामी ने सरकार पर ढिलाई बरतने का आरोप लगाते हुए सेतुसमुद्रम परियोजना रद्द करने की पैरवी की। उन्होंने कहा कि सिर्फ केंद्र की देरी की वजह से सुप्रीम कोर्ट मामले पर सुनवाई पूरी हो जाने के बावजूद 15 माह से फैसला सुरक्षित रखे हुए है। स्वामी ने कहा कि विशेषज्ञ समिति ने गत मार्च में ही अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी, लेकिन सरकार ने अभी तक अदालत को रिपोर्ट नहीं सौंपी है।
स्वामी ने दावा किया कि रिपोर्ट में कहा गया है कि सेतुसमुद्रम परियोजना का वर्तमान मार्ग ठीक नहीं है। सारे आंकड़े पुराने हैं। परियोजना के बारे में समुद्री चक्रवात व पानी के नीचे जमीनी पत्थरों के टेक्टानिक परिवर्तन आदि से जुड़ा अध्ययन नहीं किया गया है। यहां तक कि परियोजना के बारे में प्राथमिक अध्ययन भी नहीं किया गया और काम चालू कर दिया गया। इसीलिए तमिलनाडु सरकार ने परियोजना को मंजूरी नहीं दी थी।
केंद्र सरकार की तरफ से मौजूद अतिरिक्त सालीसीटर जनरल एच.पी. रावल ने कहा कि स्वामी की अर्जी का जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया जाए। उन्होंने स्वामी के आरोपों को पूरी तरह सही मानने से इन्कार किया।
उनके मुताबिक, नेशनल इंस्टीटयूट आफ ओसियनोग्राफी [एनआईओ] ने जून में पचौरी कमेटी को कुछ आंकड़े दिए हैं, जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
पीठ ने उनकी दलीलें सुनने के बाद कहा कि केंद्र सरकार इस मसले पर जल्दी ही अपना नजरिया स्पष्ट करे। पीठ ने पूछा कि आखिर कितने दिन तक मामला लटका रहेगा। सरकार चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल कर अपना नजरिया स्पष्ट करे ताकि कोर्ट फैसला सुना सके। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 11 दिसंबर की तिथि निश्चित कर दी।
सुब्रमण्यम स्वामी व कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सेतुसमुद्रम परियोजना के वर्तमान स्वरूप को चुनौती दी है। परियोजना के वर्तमान मार्ग में रामसेतु का कुछ हिस्सा टूटेगा। याचिका में रामसेतु के पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व और पर्यावरण को नुकसान के आधार पर परियोजना को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद गत वर्ष 30 जुलाई को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।