
नई दिल्ली [संजय मिश्र/टी ब्रजेश]। अफगानिस्तान में राष्ट्रपति हामिद करजई के दोबारा सत्तासीन होने से भारत को आईएसआई के खिलाफ अपनी मौजूदा मुहिम मजबूत होती नजर आ रही है।
काबुल की कुर्सी पर करजई के दोबारा कब्जे को अमेरिका अगर तालिबान के खिलाफ अपनी जंग के लिए सकारात्मक संकेत मान रहा है, तो भारत आतंक को लेकर पाक को घेरने के अपने अभियान के लिए। वहीं करजई की वापसी ने पाक के विरोध के बावजूद अफगानिस्तान में भारत की भूमिका बढ़ने के रास्ते और खोल दिए हैं।
काबुल में भारतीय दूतावास पर आतंकी हमलों में आईएसआई की भूमिका की पुष्टि करने वाले करजई के सत्ता में लौटने से विदेश मंत्रालय को काफी राहत पहुंची है। दरअसल भारत विरोधी आतंकी घटनाओं को लेकर पाक पर विश्व समुदाय का दबाव बनाने में जुटे विदेश मंत्रालय के लिए करजई का रुख इस मकसद से काफी उत्साहजनक रहा है।
शायद इसी वजह से अफगान राष्ट्रपति को बधाई संदेश देते हुए साउथ ब्लाक ने आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के मकसद की ही याद ताजा कराई। अफगानिस्तान और विश्व के लिए चुनौती बन रहे अल कायदा और तालिबान के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत पर विदेश मंत्रालय ने जोर दिया है।
आईएसआई और पाक स्थित आतंकियों के खिलाफ संघर्ष में अफगानिस्तान का साथ चाह रहे भारत को करजई के दूसरे कार्यकाल की अहमियत का भी पूरा एहसास है। तभी तो विदेश मंत्रालय ने कहा कि अफगानिस्तान में पुर्ननिर्माण, विकास और स्थायित्व के लिए भारत वहां अपनी भागीदारी भी बढ़ाना चाहता है।
निश्चित तौर पर यह बयान पाक को साउथ ब्लाक का दो टूक जवाब है जो अफगानिस्तान में भारत की बढ़ती भूमिका पर आपत्ति जताता जा रहा है। अफगानिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह बनाने पर तुली आईएसआई को काबुल में भारत की मौजूदगी खलती है।
ऊपर से भारत के साथ हमदर्दी रखने वाले नेता का सत्ता में रहना तो उसकी बेचैनी को और बढ़ाता है। ऐसे में करजई का सत्ता में लौटना उसके लिए बड़ा झटका हो सकता है। साउथ ब्लाक के कूटनीतिकार मानते हैं कि आईएसआई पर शिंकजा कसने की भारत की मुहिम को करजई की वापसी से मजबूती तो मिलेगी ही, साथ ही अफगान की सरजमीं पर उसे अपनी रचनात्मक सक्रियता बढ़ाने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी। जानकारों की माने तो अफगानिस्तान में अमेरिका और चीन की बढ़ती मौजूदगी की तुलना में भारत भी अपनी भागीदारी बढ़ाना चाह रहा था। इस क्षेत्र में अमेरिका के एकतरफा प्रभाव के जवाब में भारत ने रूस के साथ संयुक्त भागीदारी की भी पहल की थी। करजई के सत्ता में लौटने के बाद इस रणनीति पर आगे बढ़ने को लेकर भारत को कोई शंका नहीं होनी चाहिए।