आदिवासियों की उपेक्षा से पैदा हुई समस्या

 
Nov 04, 11:51 am

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को स्वीकार किया कि आदिवासियों को आर्थिक व्यवस्था में स्थान देने में व्यवस्थागत असफलता रही है, जिसके नतीजे अब खतरनाक मोड़ ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के शोषण को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि आदिवासियों के हितों के प्रति संवेदना की कमी रही है और वनों पर उनके परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने की बजाय उन पर सैकड़ों मुकद्दमे ठोंक कर उन्हें पेरशान किया गया है। प्रधानमंत्री बुधवार को यहां वन्य अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करने के अवसर पर संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि आदिवासी जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं वह बहुत ही पेचीदा है और उसे सहानुभूति तथा पूरी संवेदना से समझने की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यों को जनजातीय समुदायों के जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास करना चाहिए। विकास प्रक्रिया से उनको जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है परंतु यह शोषण का एक साधन नहीं बनना चाहिए न ही यह उनकी विशिष्ट पहचान या संस्कृति की कीमत पर होना चाहिए।

सम्मेलन में राज्यों के मुख्यमंत्री और आदिवासी मामलों के मंत्रियों के अलावा संबधित अधिकारी भाग ले रहे हैं। आदिवासियों के वन्य उपयोग अधिकार मुद्दे पर उन्होंने कहा, आदिवासियों को आर्थिक व्यवस्था में स्थान देने में व्यवस्थागत असफलता रही है। इसके नतीजे अब खतरनाक मोड़ ले रहे हैं। उन्होंने आदिवासियों के सामाजिक आर्थिक शोषण को और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

आदिवासियों के प्रति और अधिक प्रबुद्ध दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, हाल के समय में बहुत सारे आदिवासियों को कानून के जरिए परेशान किया गया है। हालांकि, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सरकारों ने आदिवासियों के पर थोपे गए मामलों को वापस लिया है। इस संबंध में एक नई शुरुआत की जरूरत है।

इसके साथ ही उन्होंने चरम पंथी वाम हिंसा के प्रति आगाह करते हुए कहा, बंदूक के साए तले किसी तरह की सतत आर्थिक गतिविधि संभव नहीं है। हिंसा का मत लोगों की मुश्किलों को और बढ़ाएगा ही।

उन्होंने कहा कि आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में आदिवासियों के हितों की अनदेखी और दशकों से उनके व्यवस्थागत तथा सामाजिक-आर्थिक शोषण का समाप्त करना होगा।

सिंह ने हालांकि, इस बात पर प्रसन्नता जताई कि आदिवासी मामलों का मंत्रालय राष्ट्रीय आदिवासी नीति पर सर्वानुमति बनाने की ओर अग्रसर है। लेकिन साथ ही कहा कि इस नीति में हमारे विशाल देश के विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे सभी आदिवासियों की विशिष्टताएं समाहित होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए आदिवासी मामलों का मंत्रालय व्यापक पैमाने पर लोगों से सलाह मश्विरा करे ताकि इसके आधार पर तैयार होने वाला दस्तावेज आमतौर पर स्वीकार्य हो सके।




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