
नई दिल्ली। माओवादियों की लगातार बढ़ रही हिंसक गतिविधियों के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को चेतावनी दी कि हिंसा कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी, क्योंकि आदिवासी इलाकों में बंदूक के साए में कोई आर्थिक गतिविधि चालू रखना संभव नहीं है। उन्होंने माना कि आदिवासियों के दशकों तक शोषण से स्थिति ने अब खतरनाक मोड़ ले लिया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आदिवासियों के हितों के प्रति संवेदना की कमी रही है और वनों पर उनके परंपरागत अधिकारों को मान्यता देने की बजाय उन पर सैकड़ों मुकदमे ठोंक कर उन्हें परेशान किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने चरमपंथी वाम हिंसा के प्रति आगाह किया कि बंदूक के साए तले किसी तरह की सतत आर्थिक गतिविधि संभव नहीं है। हिंसा लोगों की मुश्किलों को और बढ़ाएगी ही। हमें इस खतरे का पूरी शिद्दत से मुकाबला करना होगा। हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।
सिंह ने वन्य अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की समीक्षा के लिए यहां आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि आदिवासी जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं वे बहुत ही पेचीदा हैं और उसे सहानुभूति तथा पूरी संवेदना से समझने की जरूरत है।
सम्मेलन में राज्यों के मुख्यमंत्री और आदिवासी मामलों के मंत्रियों के अलावा संबधित अधिकारी भाग ले रहे हैं। आदिवासियों के वन्य उपयोग अधिकार मुद्दे पर सिंह ने कहा कि आदिवासियों को आर्थिक व्यवस्था में स्थान देने में व्यवस्थागत असफलता रही है। इसके नतीजे अब खतरनाक मोड़ ले रहे हैं। आदिवासियों के सामाजिक आर्थिक शोषण को और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। आदिवासियों के प्रति और अधिक प्रबुद्ध दृष्टिकोण अपनाने पर ज़ोर देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हाल के समय में बहुत सारे आदिवासियों को कानून के ज़रिए परेशान किया गया है .. हालांकि, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सरकारों ने आदिवासियों पर थोपे गए मामलों को वापस लिया है। इस संबंध में एक नई शुरूआत करने की ज़रूरत है। इस मौके पर आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया ने प्रधानमंत्री से मांग की कि वह उनके मंत्रालय को मजबूती प्रदान करें, क्योंकि लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उसके वित्तीय संसाधन और शक्तियां कम हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के कल्याण के लिए हमें विशेष प्रयास करने हैं लेकिन मंत्रालय को प्राप्त वित्तीय संसाधन और शक्तियां अप्राप्य हैं। मैं प्रधानमंत्री से अनुरोध करूंगा कि वह और अधिक वित्तीय तथा कानूनी शक्तियां प्रदान करके मंत्रालय को मज़बूती प्रदान करें। प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि आदिवासी मामलों का मंत्रालय राष्ट्रीय आदिवासी नीति पर सर्वानुमति बनाने की ओर अग्रसर है। लेकिन साथ ही कहा कि इस नीति में हमारे विशाल देश के विभिन्न क्षेत्रों में रह रहे सभी आदिवासियों की विशिष्टताएं समाहित होनी चाहिए।
सिंह ने सुझाव दिया कि इसके लिए आदिवासी मामलों का मंत्रालय व्यापक पैमाने पर लोगों से सलाह मश्विरा करे ताकि इसके आधार पर तैयार होने वाला दस्तावेज़ आमतौर पर स्वीकार्य हो सके। सिंह ने कहा कि आदिवासियों को हर हाल में उन परियोजनाओं से लाभ मिलना चाहिए जिनके कारण उन्हें विस्थापित होना पड़ता है। यह स्पष्ट है कि हमें यह दर्शाने की आवश्यकता है कि विस्थापित आदिवासियों को मुआवजा प्रदान करने के लिए हम कानूनों और अन्य व्यवस्थाओं में किस हद तक सुधार ला सकते हैं। उन्होंने बताया कि आदिवासियों को इस साल के अंत तक स्वामित्व का अधिकार देने संबंधी वन अधिकार अधिनियम को लागू करने के बारे में वह दो बार सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख चुके हैं।
सिंह ने कहा कि आदिवासियों को स्वामित्व का अधिकार देने के बारे में कुछ राज्यों की बेहतरीन प्रगति रही जबकि अन्य इसमें काफी पीछे रहे। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में तो स्वामित्व के दावों को प्राप्त करने की प्रक्रिया तक शुरू नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की समस्या का समाधान करने के लिए उन्हें भूमि का अधिकार देना पहला जरूरी कदम है।