
नई दिल्ली [रामनारायण श्रीवास्तव]। कमजोर केंद्र और महत्वाकांक्षी क्षत्रप, भाजपा की अधिकांश बड़ी समस्याओं की वजह बनते जा रहे हैं। कर्नाटक संकट भी कुछ इसी चरित्र का है जिसने एक सप्ताह से भाजपा आलाकमान की नींद उड़ा रखी है। बगावत कर रहे रेड्डी बंधु पार्टी के भीतर पनप रहे इसी असंतोष को भुनाकर सरकार के लिए संकट खड़ा कर रहे हैं।
इसके पहले भी अन्य राज्यों में भाजपा को उसके क्षत्रप अपने कार्य व व्यवहार से नुकसान पहुंचा चुके हैं।
दरअसल उसके अधिकांश क्षत्रप भाजपा की राजनीति के नरेंद्र मोदी माडल से इतने ज्यादा प्रभावित हैं कि वे अपने यहां भी उसी तरह से व्यवहार करते हैं। कर्नाटक का ताजा संकट भले ही बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं के कारण भाजपा आलाकमान की मुसीबत बन गया है, लेकिन इसके पीछे मुख्यमंत्री बी एस येद्दयुरप्पा की अपनी कार्यशैली भी है। यही वजह है कि रेड्डी बंधुओं को पार्टी के लगभग दो दर्जन विधायकों का और परोक्ष रूप से कुछ बड़े नेताओं का समर्थन भी मिल रहा है।
मंत्रिमंडल गठन, विभागों के वितरण व सरकार चलाने में येद्दयुरप्पा भी किसी अन्य को ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं। उनकी सरकार के दो मंत्रियों व कुछ अधिकारियों को लेकर सवाल अब भी उठ रहे हैं। दरअसल येद्दयुरप्पा भी यह समझने लगे है कि विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत में सबसे बड़ा कारक वे खुद थे, तो प्रदेश भी अपने ढंग से चलाएंगे।
अब जबकि बीते पांच साल से भाजपा केंद्रीय सत्ता से बाहर है, राज्यों के क्षत्रपों में मोदी जैसा ताकतवर दिखने की महत्वाकांक्षा कुछ ज्यादा ही जागी है, भले ही वह राज्य में सरकार वैसी न चला सकें। जहां सरकारें नहीं है, वहां पर भी क्षत्रप राज्य को अपनी लाठी से हांकना चाहते हैं। कमजोर केंद्र के चलते इस प्रवृति को बढ़ावा भी मिला है। राजस्थान में वसुंधरा राजे अपने ढंग से राज्य चलाना चाहती हैं और इसमें राज्य के नेताओं की बात तो दूर केंद्र का हस्तक्षेप तक स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उनको विधानसभा नेता पद से हटने के लिए राजी करने में भाजपा आलाकमान के पसीने छूट गए।
महाराष्ट्र में सरकार न होने पर भी भाजपा आलाकमान को गोपीनाथ मुंडे के पीछे चलना पड़ता है। हाल के चुनावों में भी काफी विरोध व आलोचनाओं के बावजूद मुंडे की बेटी को विधानसभा टिकट दिया गया था। बिहार में उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के खिलाफ भी एक बार विद्रोह हो चुका है। उत्तराखंड में भुवन चंद्र खंडूड़ी व भगत सिंह कोश्यारी के बीच संघर्ष थामने में भी भाजपा को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी।
दरअसल भाजपा में क्षत्रपों का संकट सत्ता के साथ तेजी से बढ़ा। शुरुआती दौर में जब पार्टी राज्यों की सत्ता तक सीमित थी, तब भी क्षत्रपों की निरंकुशता व महत्वाकांक्षाओं से केंद्रीय नेतृत्व को जूझना पड़ता था। राजस्थान में किसी समय भैरोंसिंह शेखावत की तूती बोलती थी। बाद में यही हालात उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के समय भी रही। इसके बाद सबसे ज्यादा समस्या तो नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से शुरू हुई। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी मोदी के अनुसार ही फैसले लेने पड़े, चाहे वह मामला हरेन पंड्या का हो, या फिर केशुभाई पटेल व उनके समर्थकों को हाशिए पर लाने का।