
तवांग [अरुणाचल प्रदेश]। बर्फीली चोटियों के बीच 10 हजार फुट की ऊंचाई पर प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज तवांग दलाई लामा के स्वागत के लिए तैयार है जिनकी छठी अरुणाचल यात्रा रविवार से शुरू हो रही है।
उस स्थान को तिब्बती आध्यात्मिक नेता की तस्वीरों वाले रंग बिरंगे पोस्टरों और झंडों से सजाया गया है जहां दलाई लामा 1959 में तिब्बत से भागने के बाद उतरे थे।
चीन और म्यांमार के बीच स्थित सामरिक महत्व वाले इस क्षेत्र में चप्पे चप्पे पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। तवांग जिला प्रशासन दलाई लामा की इस यात्रा को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए हर तरह के प्रयास कर रहा है।
अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताने वाला चीन तिब्बती आध्यात्मिक नेता की तवांग यात्रा का विरोध कर रहा है। हिमालय स्टडीज एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक लामा ताशी का कहना है कि दलाई लामा की इस यात्रा से चीन को इस बारे में कड़ा संदेश जाएगा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है।
ताशी को तिब्बती मंत्रों पर आधारित उनके गीतों के लिए ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। उनका कहना है कि लोग दलाई लामा को भगवान की तरह मानते है्रं इसलिए किसी भी कोने से उनकी अरुणाचल यात्रा का विरोध नहीं होना चाहिए।
दलाई लामा ईटानगर के लिए रवाना होने से पहले नौ से 12 नवम्बर के बीच 300 साल पुराने तवांग बौद्ध मठ तथा बोमदिला में प्रवचन देंगे।
वह 1983, 1997 और 2003 में क्षेत्र की यात्रा कर चुके हैं। 2003 में उन्होंने दो यात्राएं कीं जिनमें से एक में वह तवांग न जाकर बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय की बहुलता वाले राज्य के पश्चिमी क्षेत्र गए। बौद्ध भिक्षु से राजनीतिक हस्ती बने टीजी रिनपोचे ने कहा कि यहां के लोग दलाई लामा को करुणामई भगवान अवलोक्तस्वरा का अवतार मानते हैं।
दलाई लामा को अब तक एक भी बार न देखने वाला स्थानीय युवक रिम्पा खंडू उनकी इस यात्रा से खासा उत्साहित है। उसने कहा कि युवा बहुत उत्साहित हैं। हालांकि उन्हें कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से दलाई लामा से मिल पाने में सफल होने का पूरा विश्वास नहीं है। उसका कहना है कि इस बार कड़ी सुरक्षा व्यवस्था है और इस वजह से आम लोगों का दलाई लामा से हाथ मिलाना मुश्किल होगा।