महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में दिखा चह्वाण का रुतबा

 
Nov 07, 06:05 pm

मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में भले ही दिग्गज नेताओं के बेटा-बेटी बाजी मार ले गए हों, लेकिन मंत्रिमंडल गठित करते समय मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण ने उनमें से किसी को भाव नहीं दिया। चुनाव परिणाम आने के सत्रहवें दिन शपथ लेने वाली सरकार को देख कर लगता है कि कांग्रेस हाईकमान ने अपने मुख्यमंत्री चह्वाण को सरकार बनाने और चलाने की पूरी छूट दी है।

महाराष्ट्र की तेरहवीं विधानसभा के लिए शनिवार को कांग्रेस-राकांपा गठबंधन के कुल 38 मंत्रियों ने शपथ ली। कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण सहित 12 कैबिनेट एवं छह राज्य मंत्रियों एवं राकांपा की ओर से उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल सहित 15 कैबिनेट एवं पांच राज्य मंत्रियों ने शपथ ली। पांच मंत्रियों का शपथ ग्रहण अभी बाकी है। इन्हीं पांच मंत्रियों में अभी कांग्रेस-राकांपा का अनसुलझा झगड़ा भी छुपा है। राकांपा इन पांचों में से एक पर अभी भी अपना कब्जा मानकर चल रही है, जबकि कांग्रेस बाकी रहे सारे मंत्री अपने कोटे के बता रही है।

मंत्रिमंडल में कांग्रेस और राकांपा दोनों ने कई नए चेहरों को जगह दी है। राकांपा के मंत्रियों एवं उनकी कुल संख्या को देख कर लगता है कि अगले पूरे पांच साल वह कांग्रेस पर दबाव बनाए रखना चाहती है। जबकि राकांपा की इस मंशा से निपटने के लिए ही शायद कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री को उनकी मर्जी का मंत्रिमंडल गठित करने की छूट दी है, ताकि वे किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त होकर सरकार चला सकें।

चह्वाण ने अपने मंत्रिमंडल में किसी दिग्गज नेता के पुत्र या पुत्री को जगह नहीं दी है। माना जा रहा था कि राहुल गांधी की युवा ब्रिगेड तैयार करने के लिए अशोक इस बार केंद्रीय मंत्रियों सुशील कुमार शिंदे, विलासराव देशमुख एवं राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पुत्र-पुत्रियों को कम से कम राज्य मंत्री तो बनाएंगे ही। लेकिन नहीं। नारायण राणे, पतंगराव कदम या पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के समर्थकों को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है। इसके बजाय चह्वाण ने अपने करीब आधा दर्जन समर्थकों को मंत्रिमंडल में लेकर महाराष्ट्र की मराठा राजनीति में अपनी ताकत बढ़ाने के संकेत दे दिए हैं। यह और बात है कि देशमुख एवं राणे जैसे मराठाओं से उन्हें अपनी पार्टी में ही तगड़ी टक्कर मिलती रहने की पूरी संभावना है।

महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे एवं मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह को गत लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों मेंच्अच्छा परिणाम दिलवाने के बावजूद मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। कृपाशंकर को मुंबई में उत्तार भारतीयों के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमंडल में लिए जाने की उम्मीद थी। लेकिन चह्वाण ने उक्त दोनों अध्यक्षों पर संगठन की जिम्मेदारी होने के बहाने उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर रखा और कृपाशंकर के बजाय पिछली सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे मुहम्मद आरिफ नसीम खान को इस बार कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर एक ही व्यक्ति से उत्तार भारतीय एवं मुस्लिम दोनों कोटों का काम चला लिया। नसीम खान भी उत्तार प्रदेश के आंबेडकर नगर [अकबरपुर] जनपद के मूल निवासी हैं। कुछ विवादों में नाम उछलना भी उक्त दोनों अध्यक्षों के मंत्रिमंडल से बाहर रहने का कारण माना जा रहा है।

चह्वाण को छोड़ सब चूके

दूसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने अशोक चह्वाण पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शंकर राव चह्वाण के पुत्र हैं। गत वर्ष 26 नवंबर के आतंकी हमले के बाद जब विलासराव देशमुख पर पद छोड़ने का दबाव बना तो उन्होंने अपने विकल्प के रूप में अशोक चह्वाण का नाम सामने रखा था। उनकी सोच थी कि मराठवाड़ा की राजनीति में उनके कनिष्ठ रहे अशोक चह्वाण इसका अहसान मानेंगे और भरत की तरह कभी भी उनके लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को तैयार रहेंगे। लेकिन अशोक चह्वाण ने पद संभालते ही मराठवाड़ा की राजनीति में ही देशमुख के लिए चुनौतियां खड़ी करनी शुरू कर दीं और अपनी हर रणनीति में सफल रहते हुए पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों में पार्टी कचे अच्छी सफलता दिलाई। अपने गृहनगर नांदेड़ की तो सारी सीटें वह कांग्रेस की झोली में डालने में सफल रहे, जबकि उनके प्रबल प्रतिद्वंद्वी देशमुख और नारायण राणे अपने जिलों में यह कारनामा नहीं दिखा सके। इस कारण अशोक और मजबूत होकर उभरे हैं।

दबाव बनाने में माहिर हैं भुजबल

तीसरी बार उप मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले छगन भुजबल को उनकी पार्टी राकांपा में मराठाओं की आंख की किरकिरी माना जाता है। लेकिन महाराष्ट्र में पिछड़े वर्गों के बीच उनकी पैठ ही पार्टी अध्यक्ष शरद पवार की ऐसी मजबूरी है कि न चाहते हुए भी उन्हें अपने भतीजे अजीत पवार को नाराज करके भुजबल को तीसरी बार उप मुख्यमंत्री का ताज पहनाना पड़ा है। राजनीति में शिवसेना की पैदावार भुजबल दबाव बनाने में माहिर हैं। अब से करीब 20 साल पहले सूर्य जैसे तप रहे बाल ठाकरे को चुनौती दे चुके भुजबल इस पद पर रहते हुए विपक्ष के साथ-साथ सत्ता में अपने वरिष्ठ सहयोगी मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण पर भी दबाव बना सकते हैं। अपने इसी गुण के कारण वह गत लोकसभा चुनाव में अपने भतीजे समीर भुजबल को एवं गत विधानसभा चुनाव में पुत्र पंकज भुजबल को न सिर्फ पार्टी का टिकट दिलवाने में सफल रहे, बल्कि उन्हें चुनवा कर भी लाए। उनके इन्हीं गुणों के कारण पार्टी के मराठा नेता उनसे खार खाते हैं। इस बार तो उन्हें इस पद पर रहते हुए ही इन मराठाओं से चुनौती मिलने की पूरी उम्मीद है। वह भी अजीत पवार के ही नेतृत्व में।




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(7) वोट का औसत

average:5
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • राजनीति
    Add to My Yahoo! xml
  • अपराध
    Add to My Yahoo! xml
  • दुर्घटना
    Add to My Yahoo! xml
  • आतंकवाद
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2009 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित