नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। जम्मू-कश्मीर के मसले का हल निकालने के इरादे से सरकारी स्तर पर बातचीत से पहले यह सार्वजनिक मंच पर हुई एक अहम बातचीत थी। सूबे की सियासत में ये मौका इसलिए बेहद खास था, क्योंकि पहली बार यहां की सभी मुख्यधारा की पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां, अलगाववादी नेता और राज्य से उजड़ चुके कश्मीरी पंडित एक साथ एक टेबल पर थे। इनके बीच जम कर बहस हुई, आरोप-प्रत्यारोप हुए, लेकिन खुल कर महत्वपूर्ण बातचीत हुई और एक-दूसरे को साथ ले कर चलने का भरोसा दिया गया।
जम्मू-कश्मीर में अमन का नया अभियान चला रही केंद्र सरकार सहित कश्मीर मसले का हल चाहने वाले तमाम लोग इस बात से सुकून हासिल कर सकते हैं कि चाहे गैर सरकारी मंच पर ही सही, लेकिन अलगाववादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस के अब्दुल गनी बट, एक समय हथियारों की जुबान बोलने वाले जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के यासिन मलिक, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस के सैफुद्दीन सोज और नेशनल कांफ्रेंस से मुहम्मद शफी उरी और पणुन कश्मीर के संजय टिक्कू न सिर्फ पहली बार बातचीत के लिए एक साथ बैठे, बल्कि किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश भी करते नजर आए।
यासिन मलिक की मौजूदगी से बेहद नाराज कश्मीरी पंडितों ने उनके बोलने पर जम कर हंगामा भी किया। इस पर मलिक ने भी तेवर दिखाए। लेकिन आखिरकार सब ने बैठ कर बातचीत की। मलिक ने माना कि जिन पंडितों के किसी अपने के साथ इतना अत्याचार हुआ हो, उनके अंदर ऐसी भड़ास होना लाजमी है, साथ ही उन्होंने हथियार उठाने के अपने फैसले के पीछे भी ऐसी ही वजह बताई।
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा, ऐसी बातचीत एक-दूसरे पर विश्वास कायम करने की दिशा में काफी अहम हो सकती है। महबूबा ने कहा कि वह भारतीय संविधान की कसम जरूर खाती हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राज्य के लोगों की भावनाओं को नहीं उठाएंगी। उन्होंने हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी को राज्य का सबसे सम्मानित अलगाववादी नेता बताते हुए कहा कि बातचीत की प्रक्रिया में उन्हें जरूर शामिल किया जाना चाहिए। अलगाववादी नेता बट ने तत्काल कश्मीरियों में विश्वास पैदा करने वाले कदम उठाने की वकालत की। इसके लिए उन्होंने सेना की मौजूदगी लगातार कम करने को सबसे जरूरी बताया।
सूबे की राजनीति में सक्रिय अधिकांश नेताओं ने कश्मीर को ज्यादा स्वायत्तता देने की बात की। सीमाओं को अप्रासंगिक बनाने की अपील भी की। यासिन मलिक ने भले ही इस बातचीत की प्रक्रिया को हिंदुस्तानी सिविल सोसाइटी की कश्मीरियों को धोखा देने की कोशिश बताया, लेकिन अपने सामने अपने ऊपर लगाए गए तमाम आरोपों के बावजूद इसमें न सिर्फ भाग लिया, बल्कि घंटों बैठ कर लोगों को सुना भी।
कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज ने कहा कि कश्मीर का हल तभी निकल सकता है, जब सभी पक्ष व्यावहारिक बातचीत करें। धारा 370 को खत्म करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास भी नहीं। ऐसे में इस तरह की बात करना बेमानी है। इसी तरह अलगाववादी नेताओं को भी यह समझना होगा कि यह मसले के हल के लिए उपयुक्त मौका है। प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति है और वो खुले जेहन से बातचीत कर रहे हैं, इसलिए इस मौके का फायदा उठा कर तुरंत बातचीत में शामिल होना चाहिए।
इस गोलमेज बातचीत का आयोजन गैर सरकारी संगठन सेंटर फार स्टडीज आफ डेवलपिंग सोसाइटीज ने किया था। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर और मशहूर वकील राम जेठमलानी ने अहम भूमिका निभाई थी।