श्रीनगर [नवीन नवाज]। कश्मीर मुद्दे को फिलहाल दस साल के लिए स्थगित करने की भारत-पाक की कवायद के बीच ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस का उदारवादी खेमा भी अपनी कश्मीर नीति में बदलाव लाता दिख रहा है। हालात ऐसे दिख रहे हैं कि हुर्रियत सहित कुछ अन्य अलगाववादी दल अगले विधानसभा चुनावों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में हिस्सा ले सकते हैं।
सूत्रों ने बताया कि हुर्रियत कांफ्रेंस का उदारवादी खेमा अब पिछली गलतियों को दोहराने के मूड में नहीं है। चुनावी सियासत के मद्देनजर हुर्रियत के संविधान और संगठनात्मक ढांचे में बदलाव के प्रयास किए जा रहे हैं। मीरवाइज का खेमा चुनावी सियासत में उतरने से पहले कश्मीर मुद्दे पर केंद्रीय पैकेज पर नजर गड़ाए हुए है।
वह यह देख रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे को लेकर विभिन्न फार्मूलों पर जारी काम किस अंजाम तक पहुंचता है। कश्मीर की आजादी के बजाय अब कश्मीर की बेरोजगारी, बिजली-पानी के संकट जैसे मुद्दों को तवज्जो दी जा रही है।
मीरवाइज और डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के चेयरमैन शब्बीर शाह दिल्ली से लौटने के बाद राज्य में जनसंपर्क सभाएं शुरू करेंगे।
डॉ. मुस्तफा कमाल, नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। अलगाववादियों को समझ आ गया कि किसी भी मसले का हल गोली से नहीं, बल्कि बोली से होता है। चुनाव में भाग लेने से हुर्रियत अपनी खोई हुई साख और लोकप्रियता वापस हासिल कर सकती है।
मुजफ्फर हुसैन बेग, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व उपमुख्यमंत्री ने कहा कि अगर हुर्रियत चुनावी सियासत में आती है तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन क्या सचमुच पाकिस्तान हुर्रियत को चुनाव लड़ने की अनुमति देगा? वैसे हुर्रियत को यह कदम बहुत पहले उठाना चाहिए था। इससे कश्मीर मसले के हल में ही मदद होगी।
सैयद अली शाह गिलानी, ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस [कट्टरपंथी गुट] के चेयरमैन ने कहा कि कश्मीर मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालना अनुचित है। कश्मीरी अवाम ऐसा नहीं होने देगी। अगर ऐसा कुछ किया गया तो यह सभी के लिए घातक होगा। कश्मीर मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने के बजाय पाकिस्तान अब भारत के साथ सहमति जता रहा है।
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