सीतापुर [राजकेश्वर सिंह]। कुछ न कुछ पाने की उम्मीद सपा, भाजपा और काग्रेस समेत दूसरे दलों को भी है, लेकिन पहले चरण के चुनाव में खोने का सबसे ज्यादा खतरा बसपा को ही है। मायावती के सामने 30 विधायकों वाले अपने इस किले को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है। दागदार मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटने के बावजूद पार्टी अपने पक्ष में पहले जैसा माहौल नहीं बना पा रही है। लिहाजा जीत का सारा दारोमदार बसपा प्रत्याशियों की छवि और उनकी राजनैतिक हैसियत पर आकर टिक गया है।
बसपा और उसकी मुखिया मायावती के सामने पहले ही चरण के चुनाव की 55 सीटों पर चुनौती इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इस चरण की 55 सीटों में से 30 पर अकेले उसका कब्जा है। जबकि सब कुछ दाव पर लगाकर चुनाव में उतरी काग्रेस के पास महज तीन, भाजपा चार और समाजवादी पार्टी 18 सीटों पर है। बड़ी बात यह है कि 2007 के विधानसभा चुनाव में बडे़ जोरशोर से लड़ने वाली बसपा की दिक्कतें राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले से ही शुरू हो गई हैं। पिछली बार बाराबंकी की आठ सीटों में से पाच पर बसपा और तीन पर सपा जीती थी। जबकि इस बार बाराबंकी सीट पर लड़ रहे दो बार के बसपा विधायक व प्रदेश सरकार में रेशम उद्योग मंत्री संग्राम सिंह को सपा के उस धर्मराज सिंह उर्फ सुरेश यादव से जूझना पड़ रहा है, जो कभी संग्राम सिंह के ही सिपहसालार हुआ करते थे। इसी तरह पार्टी को रामनगर, दरियाबाद में भी सपा प्रत्याशियों से ही सीधा मुकाबला करना पड़ रहा है। जबकि हैदरगढ़ सीट पर लड़ाई भाजपा और सपा व जैतपुर में काग्रेस व सपा के बीच सिमटती जा रही है।
इसी तरह सीतापुर में एक-दो सीटों को छोड़ कर बाकी पर समाजवादी पार्टी, बसपा के लिए सिरदर्द साबित हो रही है। पिछली बार के चुनाव में जिले की नौ सीटों में से पाच पर सपा और चार पर बसपा थी। इस बार भी दोनों पार्टियों ने अपने मौजूदा विधायकों को ही मैदान में उतार दिया है। लहरपुर सीट से बसपा विधायक जासमीर अंसारी मैदान में हैं। उनकी पत्नी कैसरजहा बसपा सासद हैं लेकिन काग्रेस ने यहा से सपा से आए अनिल वर्मा को उतार कर बसपा का संकट बढ़ा दिया है तो दूसरी तरफ हरगाव सीट से बसपा प्रत्याशी व प्रदेश सरकार में मंत्री रामहेत भारती को हराने का अभियान चल रहा है। जबकि महोली, महमूदाबाद और मिश्रिख सीट पर भी सपा, बसपा पर भारी पड़ती दिख रही है।
गोण्डा में पिछली बार जिले की छह सीटों में से बसपा दो पर जीती थी। परिसीमन के बाद इस बार जिले में सात सीटें हो गई हैं। लेकिन मेहनौन और कर्नलगंज को छोड़ बाकी सीटों पर बसपा सीधी लड़ाई में नहीं दिख रही है। जबकि कटराबाजार, गोण्डा, गौराबाजार, मनकापुर और तरबगंज सीट पर लड़ाई सपा और भाजपा के बीच सिमटती दिख रही है। इसी तरह बहराइच में भी बसपा के लिए बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं। मायावती ने बहराइच सीट से साल भर पहले महफूज को दिया बसपा का टिकट चुनाव के पहले काट दिया। बाद में अब्दुल को दिया उसे भी काट दिया। अब मुशर्रफ खान लड़ रहे हैं, जो बाहरी हैं। यहा पीस पार्टी के हाजी जुबेर और उलेमा कौंसिल के मौलाना वली उल्ला सपा के वकार अहमद शाह व बसपा के मुशर्रफ खान दोनों की परेशानी बढ़ा रहे हैं। पयागपुर, कैसरगंज, महसी, बलहा और मटेरा में भी बसपा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
पहले चरण की 55 सीटों के इस चुनाव में बसपा के लिए यह स्थिति इसलिए भी अच्छी नहीं कही जा सकती, क्योंकि पार्टी प्रमुख मायावती ने चुनाव से ठीक पहले इस क्षेत्र से जुडे़ लगभग आधा दर्जन मंत्रियों और दर्जन भर विधायकों को दागदार मानते हुए उनका टिकट काट दिया। कई को तो पार्टी से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। बावजूद इसके पहले चरण के चुनाव वाली ज्यादातर सीटों पर पार्टी के पक्ष में माहौल कतई बेहतर नहीं हो पाया है। हालांकि, दलितों में बसपा के आधार में कोई कमी नहीं दिखती। बहराइच शहर के करीब अंबेडकर गाव तमाचपुर [चमरगढै़या] निवासी केदारनाथ भास्कर मोची का काम करते हैं। उन्होंने कहा, हमारे यहा दो हजार की आबादी है। सभी लोग हाथी को इसलिए वोट देंगे क्योंकि यहा नाली, खडं़जा, बिजली सब कुछ बहन जी की बदौलत आया है। वे यहा खुद आई थीं। उनकी वजह से हम लोगों का भी जीवन बदला है।
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