लखनऊ [अवनीश त्यागी]। कौरव व पांडवों के राज्य हस्तिनापुर की धरती पश्चिम उप्र में होने वाली आखिरी जोर-आजमाइश के लिए सभी राजनीतिक दलों ने अब अपना पूरा ध्यान यहीं पर केंद्रित कर लिया है। यहां का चुनाव परिणाम सरकार के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता आया है। वैसे इस बार पश्चिम की राजनीतिक स्थितियां पिछले चुनाव से थोड़ा भिन्न हैं। यहां कांग्रेस और रालोद की सियासी दोस्ती की भी इम्तिहान है और बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की परख भी होगी। साथ ही आंका जाएगा मजहबी आरक्षण विरोध के भाजपाई फंडे का असर। पिछले विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में सपा की साइकिल बसपा के हाथी से काफी पिछड़ जाने के कारण ही मुलायम सिंह का सत्ता में बने रहने का सपना पूरा न हो सका था।
छठे और सातवें चरण में पश्चिम के 23 जिलों के 128 विधानसभा क्षेत्रों में वोट डाले जायेंगे। पिछले दो चुनाव से यहां दलित-मुस्लिम- पिछड़ा गठजोड़ दबदबा कायम किए हुए है। वर्ष 2007 में बसपा ने यहां सपा की 21 सीटों के मुकाबले 62 सीटें हासिल कर निर्णायक बढ़त ली जबकि महज तीन सीटें जीत सकी कांग्रेस के लिए पश्चिमी उत्तार प्रदेश वाटर लू ही बना रहा। इसे देखते हुए ही कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण मुद्दे पर टप्पल व भट्टा पारसौल गोलीकांड जैसे विवादों को गर्मा कर क्षेत्र में पैर जमाने की भरपूर कोशिशें की। अब चुनावी जंग में रालोद भी उनके साथ है। राहुल 21 फरवरी से तीन दिन तक अजित सिंह व जयंत को संग लेकर पश्चिम फतेह के इरादे से निकलेंगे। केंद्रीय मंत्रियों के अलावा सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सभाएं भी होगी। तीन नये जिले पंचशीलनगर, भीमनगर व प्रबुद्धनगर तथा धौलाना को तहसील बनाकर बसपा ने क्षेत्रीय जनता की भावनाओं को उभारा।
गन्ना समर्थन मूल्य गत पांच वर्ष में दो गुना से अधिक बढ़ा कर शुगर बॉउल माने जाने वाले क्षेत्र के किसानों को सड़कों तक नहीं आने दिया लेकिन अब चीनी मिलों द्वारा किसानों का करीब 3570 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य रोक लेने से मुश्किलें पैदा होती दिख रही है। पश्चिम उप्र में वापसी के लिए सपा भी कोई कसर नहीं छोड़े है। मुस्लिमों में पैठ बनाने को 18 प्रतिशत आरक्षण कोटा देने का वादा करने के अलावा उसने शाही इमाम मौलाना अहमद बुखारी को भी साथ लिया है। टिकट बंटवारे में बसपा के अलावा रालोद कांग्रेस गठजोड़ का जवाब देने के लिए सपा ने 42 मुस्लिमों को चुनाव में उतारा। इस पार्टी ने पिछड़ों में अतिपिछड़ों और अनुसूचित वर्ग को आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में गैर जाटव उम्मीदवार उतार बसपा को पछाड़ने की रणनीति तय की है।
अंतिम दो चरणों के चुनाव से भाजपा भी पूरी आस लगाए है। नब्बे के दशक का प्रदर्शन दोहराने के लिए इस बार पश्चिम में भाजपाई अभियान की कमान खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी संभाले हैं। गाजियाबाद से ही चुनावी मुहिम का संचालन हो रहा है। पिछले दो चुनावों में भाजपा के विरोध में मुस्लिमों की लामबंदी का नुकसान भुगत चुका नेतृत्व इस बार पूरा सतर्क है। मुस्लिमों को रिझाने के लिए बदायूं जिले से पहली बार मुस्लिम उम्मीदवार भी उतारा। पिछड़ा वर्ग मुस्लिम सम्मेलन भी किए जा रहे है।
मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर