जयपुर [राजकिशोर]। यहां की आतंकी घटना के तार अजमेर शरीफ से जुड़े लग रहे है। अजमेर शरीफ में विस्फोटों के तार हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए विस्फोटों से जुड़े थे। मक्का के सूत्र मालेगांव से संबद्ध थे। मालेगांव की घटना का नाता उत्तर प्रदेश की अदालतों व धार्मिक स्थलों में हुए विस्फोटों से था। उत्तर प्रदेश की घटनाओं के तार मुंबई लोकल ट्रेन, दिल्ली बम विस्फोट और समझौता एक्सप्रेस या अन्य हादसों से जुड़े थे।
कुल मिलाकर पिछले चार वर्षो में हुई आतंकी वारदातों की जांच के बाद विभिन्न एजेंसियों या खुफिया तंत्र को घटनाओं को जोड़ने वाले इन 'तारों' के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ है। घटनाओं को अंजाम देने वाले मास्टर माइंड तक जांच एजेंसियां कभी पहुंच ही नहीं सकीं। जयपुर में हुए हादसे के बाद भी अभी तक की प्रगति भी पुरानी राह पर ही नजर आ रही है। जयपुर आए केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी सिर्फ यही कह पाए कि 'घटना को अंजाम देने वालों को दंडित करने की कोशिश की जाएगी।' यानी भरोसा उन्हें भी नहीं है। राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया के पास भी बताने के लिए कुछ नहीं था। पिछली घटनाओें की तरह काम को अंजाम देकर आतंकी तत्व शातिराना तरीके से भूमिगत हो गए तो फिर जांच एजेंसियों के पास बहुत कुछ करने को नहीं रह जाएगा। एजेंसियों की आखिरी उम्मीद सिर्फ यह है कि घटना का मददगार कोई स्थानीय शख्स उनके हाथ लगे और उससे कुछ काम की जानकारी हाथ लग जाए।
गृह मंत्रालय और जांच में जुटे अधिकारी सिर्फ एक बात पर मुतमईन है कि घटना के पीछे कोई बड़ा आतंकी संगठन ही है। दिल्ली राजधानी क्षेत्र स्थित उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद से भेजे गए ई-मेल में किसी इंडियन मुजाहिदीन संगठन द्वारा जिम्मेदारी लेने के बयान को एजेंसियां भ्रामक मान रही है। एक उच्चपदस्थ सूत्र के मुताबिक यह एजेंसियों को गुमराह करने के लिए भी किया गया है। एक बात तय है कि पिछली घटनाओं को अंजाम देने वाले तत्व ही जयपुर कांड के पीछे भी है। पिछली बार अजमेर शरीफ में हुए विस्फोटों के संबंध में भी दिल्ली के शकरपुर से ही एक प्राइवेट साइबर कैफे से मेल किया गया था। इसलिए जांच एजेंसियां इन दोनों घटनाओं को जोड़ रही है। साथ ही मान कर चल रही है कि मास्टरमाइंड या आतंकियों का कोई माडयूल दिल्ली या आस-पास से अपनी कार्रवाई को अंजाम दे रहा है।
यहां काबिलेगौर है कि राजस्थान से पहले जिन राज्यों में हादसे हुए चाहे वह महाराष्ट्र हो, दिल्ली या फिर उत्तर प्रदेश, सबके पास आतंकवाद से जूझने का तंत्र रहा है। राजस्थान पुलिस इस मामले में बेहद पिछड़ी हुई है। वे राज्य भी अभी तक उन हादसों की तह तक नहीं पहुंच सके। अजमेर शरीफ की घटना के बाद भी नहीं चेती राजस्थान सरकार अब उधार के विशेषज्ञों के सहारे अपराधियों को पकड़ने की कोशिश कर रही है। वसुंधरा सरकार ने दिल्ली से विशेषज्ञों के अलावा उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधी दस्ते के अफसरों को बुलाया है। गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) एसएस. कुमावत तो यहां रुके ही हुए है।
सूत्रों के मुताबिक, तकनीक से लेकर देश भर में फैले सुरक्षा तंत्र की मदद लेने के बावजूद कम से कम अभी तक सरकार के हाथ कोई पुख्ता जानकारी नहीं लगी है। अंधेरे में ही तीर चलाए जा रहे है। घटना के दूसरे दिन एक युवक के बयान और बताए गए हुलिए के आधार पर शमीम नामक व्यक्ति का फोटो प्रकाशित होने के बाद भी अभी तक कोई नई जानकारी नहीं मिली है। अब रहमत नाम के एक आदमी को और पकड़ा गया है। एक संदिग्ध महिला और दो बच्चों की तलाश जारी है। साहिबाबाद में कैफे मालिक को उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने हिरासत में लिया है।
इस बीच यह सवाल उठने लगा है कि आतंकवाद का बारूद रंग-रंगीले राजस्थान में आखिर कहां से आया? यहां के लोग भी हैरान है। गुलाब के इत्र और अगरबत्तियों की महक से गुलजार रहने वाले अजमेर शरीफ की फिजा ने पहली बार बारूद की गंध महसूस की। इसके बाद अब गुलाबी नगरी को लहूलुहान कर दिया। किसकी नजर लगी 'म्हारे देस' को? इन सवालों के बीच करीब दो साल पहले बाड़मेर के मुनाबाव से पाकिस्तान के खोखरापार तक शुरू हुई ट्रेन पर लोगों की निगाहे टिकने लगी है। 18 फरवरी 06 से शुरू हुई इस ट्रेन से आने वाले पाकिस्तानियों के पास से नकली नोट और तस्करी का अन्य सामान कई बार बरामद हुआ। यह ट्रेन तस्करी के लिए तो बदनाम ही थी। इसके आने के बाद ही राजस्थान को आतंकवाद के राक्षस ने भी घायल किया। सुरक्षा कारण ही थे कि राजस्थान सरकार ने रेल मंत्रालय के इस ट्रेन को मुनाबाव के बजाय अजमेर शरीफ तक बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध किया। अब जांच एजेंसियां इस ट्रेन के यात्रियों के जांच इंतजामों पर भी सवाल उठा रही है।