
सिलीगुड़ी, [राजेश कुमार सिंह]। भारत-बांग्लादेश और भारत-नेपाल सीमा से घुसपैठ रोकने के भले ही बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, मगर हकीकत कुछ इतर ही है। बेटी-रोटी का संबंध और गरीबी घुसपैठ में सर्वाधिक सहायक साबित हो रही है। इसी विवशता का लाभ उठाकर घुसपैठिये भारतीय सुरक्षाकर्मियों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। इसमें उनके अधिकतम हजार रुपये खर्च होते हैं।
बांग्लादेश व नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में भारत के सीमावर्ती इलाकों के नागरिकों की रिश्तेदारी है। इसी रिश्तेदारी की चादर ओढ़ कर कई बार आतंकी भारतीय क्षेत्र में घुस आते हैं। यदि सुरक्षाकर्मियों को संदेह हुआ तो घुसपैठिये इसी रिश्तेदारी का हवाला देकर बच जाते हैं। यदि घुसपैठिया पकड़ा भी गया तो उसके स्थानीय रिश्तेदार उसकी जमानत ले लेते हैं। पिछले 3 सितंबर को सात बांग्लादेशी घुसपैठियों को एक भारतीय दलाल के साथ स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, सभी घुसपैठिये युवा हैं। पुलिस पूछताछ में जो तथ्य सामने आए उसके मुताबिक, भारतीय दलाल हैदर अली ने घुसपैठ कराने के एवज में प्रति व्यक्ति एक-एक हजार रुपये वसूले थे। उन्हें दिल्ली में काम दिलाने का आश्वासन भी दिया गया था। ये घुसपैठिए बांग्लादेश के दिनाजपुर जिले के बेरइल गांव के निवासी हैं। उनका कहना था कि भारतीय क्षेत्र में बांग्लादेशी नागरिकों की रिश्तेदारी भी घुसपैठ में सहायक साबित हो रही है। बीएसएफ के आईजी स्तर के एक अधिकारी ने सिलीगुड़ी में स्वीकारा था कि घुसपैठियों में कई बार आतंकी भी होते हैं। घुसपैठियों के बयान से इतना तो खुलासा हो ही गया कि सीमा पर व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई व भुखमरी घुसपैठ व आतंकवाद की फसल लहलहाने में खाद का काम कर रही हैं।
बांग्लादेश में आय का मुख्य स्रोत धान एवं जूट की खेती है। मछली पालन पर वहां का अर्थव्यवस्था टिकी है। इसके अलावा कोई बड़ा उद्योग व कल-कारखाना नहीं है। वहां गरीबी व बेरोजगारी का बड़ा कारण भी यही है। समय-समय प्राकृतिक आपदाएं भी बांग्लादेशी नागरिकों को भारत में घुसपैठ को विवश करती रहती हैं। मगर उनके वेश में घुसपैठ करने वाले आतंकियों ने बेरोजगारों व गरीबों को संदिग्ध बना दिया है।