
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। रावलपिंडी में सोमवार को हुए आतंकी हमलों ने अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के उस बयान की पुष्टि कर दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि पाक की सरजमीं पर आतंकी संगठन न केवल मौजूद हैं बल्कि पूरी तरह सक्रिय भी हैं। अपनी इस टिप्पणी के साथ हिलेरी के पाक से रवाना होने के कुछ घंटों बाद ही आतंकी हमलों से इसका प्रमाण भी मिल गया। अमेरिका इसे पाक की सरजमीं में ही पनप रहे आतंकी संगठनों की करतूत के तौर पर देख रहा है। अगर पाक ने इस घटना में तालिबान का हाथ बताया है तो भी अमेरिका यह मान रहा है कि ऐसे हमले को स्थानीय आतंकी नेटवर्क की मदद जरूर मिली होगी।
अपने यहां हो रहे आतंकी हमलों में सीमा पार से मदद मिलने का आरोप लगा पाक ने हमेशा भारत पर अंगुली उठाने की कोशिश की है। पाक ऐसा दुनिया का ध्यान अपनी सरजमीं पर सक्रिय आतंकी संगठनों से हटाने के लिए भी करता रहा है। यही वजह है कि तालिबान को भारत से वित्तीय मदद मिलने की तोहमत पाकिस्तानी आतंरिक सुरक्षा मंत्री रहमान मलिक ने मढ़ी थी। उनका इशारा एक तरह से पाक पर हमलावर हो रहे तालिबान को भारत की शह मिलने की तरफ था।
लेकिन अब हिलेरी का यह कहना कि पाक में आतंकी संगठन मौजूद हैं, भारत के लिए कूटनीतिक लिहाज से फायदे की बात है। सूत्रों के अनुसार हिलेरी का गुस्सा पाक पर इसलिए भी फूटा था क्योंकि अल कायदा के बारे में पूछे जाने पर इस्लामाबाद के नेताओं ने उनसे यही कहा था कि उनके यहां आतंकवाद सीमा पार से हो रहा है। अमेरिका पहले भी कह चुका है कि तालिबान को अल कायदा की मदद मिलती रही है। भारतीय कूटनीतिकार मानते हैं कि अल कायदा या दूसरे संगठन के आतंकियों के बारे में जानकारी दबाने को लेकर पाक पर अमेरिकी आरोपों का हमला अब और तेज हो सकता है।
गौरतलब है कि हिलेरी ने कहा था कि पाक की नागरिक सरकार को यह नहीं मालूम कि अल कायदा का नेतृत्व कहां है। जाहिर है उन्होंने यह बात जोर देकर यह रेखांकित करने के लिए भी कही थी कि ऐसी सरकार नागरिकों के प्रति जिम्मेवार होती हैं और इस लिहाज से उन्हें आतंकी संगठनों के पते ठिकानों का खुलासा करने में जरा सी भी हिचक नहीं दिखानी चाहिए।