1962 में चीन के खिलाफ सैन्य पराजय भारत के लिए एक कष्टप्रद घटना थी और यह पराजय इसलिए हुई, क्योंकि चौथी डिवीजन का कमांडर नाजुक मौके पर अपने स्नायु तंत्र पर काबू नहीं रख सका और उसने पीछे हटने का जो आदेश दिया वह भारतीय सेनाओं के शिकस्त खाने का कारण...
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी जब संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करेंगे तो लोगों को उनसे आयकर का बोझ कम करने की अपेक्षा होगी। वित्तमंत्री के समक्ष एक ओर देश के बहुमुखी औद्योगिक, आर्थिक विकास की चुनौती है वहीं दूसरी ओर उन्हें...
नीर-क्षीर विवेकी हंस की भांति विमल बुद्धि रखने वाले आचार्य जब इस संसार की रचना का अवलोकन करते है तब वे इसे सागर की भांति निरूपित करते हुए कहते है कि जिस तरह से सागर के ओर-छोर का पता नहीं है उसी तरह से इस संसार का ओर-छोर अज्ञात है। सागर की गहराई...
पिछले पांच साल लालू प्रसाद के रेल बजट की काफी तारीफ हुई और जब इस बार नई रेल मंत्री ममता बनर्जी के बजट पेश करने की बारी थी तो संसद में ज्यादातर लोग यह कह रहे थे कि वह लालू प्रसाद की बराबरी नहीं कर पाएंगी और उनका बजट सिर्फ बंगाल के गरीब लोगों तक...
आमतौर पर यह समझा जाता है कि उपभोग और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और भारतीय समाज में जहा दिखावा करने वालों का प्रतिशत अस्सी हो वहा विकास और उपभोग को गहराई से समझने की जरूरत है। गावों में और शहरों की जीवन शैली को समझे बगैर कोई भी धारणा बनाना गलत हो...
भगवान के प्रति तीव्र अनुराग अथवा अनुरक्ति तथा निष्कपट एकनिष्ठ निष्काम प्रेम सहित चित्तवृत्ति का निरंतर प्रभु में लीन रहना 'भक्ति' है। देवर्षि नारदजी ने भगवान् के क्षणिक विस्मरण से चित्त में परम व्याकुलता की अनुभूति को प्रेमा-भक्ति का...
जब से भारत और चीन आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं, उसी समय से उन पर दुनिया भर की निगाहें लगी हैं। ये दो जनसांख्यिकीय दिग्गज आर्थिक विकास के आकाश में एक साथ छलांग लगा रहे हैं। दोनों देश वैश्विक सत्ता परिवर्तन को रेखांकित करने में मददगार बन रहे हैं,...
अपने देश में करीब 13 हजार लोगों की सुरक्षा के लिए 45 हजार पुलिस वालों को ड्यूटी पर लगाया जाता है। दिल्ली में ही सुरक्षा के काम में दिल्ली पुलिस की एक चौथाई ताकत लगी रहती है और वीआईपी सुरक्षा उपलब्ध कराने में सरकारी खजाने से करीब 6 अरब रुपया...
हमारा देश कैसे चल रहा है, कौन इसे चला रहा है, नीतिया कैसे बन रहीं हैं उनका हश्र क्या हो रहा है आदि प्रश्नों पर जब हम विचार करते हैं तो हमारे सामने अत्यंत चिंतानक स्थिति उभरती है। ऐसा लगता है मानो हर आर्थिक नीति के पीछे कुछ ऐसी अदृश्य शक्तिया काम...