प्रसंगवश- फिरदौस खान

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा विधेयक 2007 के संशोधित मसौदे पर अपनी मंजूरी की मोहर लगाकर वाकई एक सराहनीय काम किया है। इसके साथ ही मंत्रिमंडल ने गांधी जयंती पर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी देकर भी मजदूरों को एक बड़ी राहत देने की घोषणा की। भारत में हर साल काम के दौरान हजारों मजदूरों की मौत हो जाती है। सरकारी, अ‌र्द्ध सरकारी या इसी तरह के अन्य संस्थानों में काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों या उनके आश्रितों को कुछ न कुछ मुआवजा तो मिल ही जाता है, लेकिन सबसे दयनीय हालत है दिहाड़ी मजदूरों की। पहले तो इन्हें काम ही मुश्किल से मिलता है और अगर मिलता भी है तो काफी कम दिन। अगर काम के दौरान मजदूर दुर्घटनाग्रस्त हो जाएं तो उन्हें मुआवजा भी नहीं मिल पाता।

देश में कितने ही ऐसे परिवार हैं जिनके कमाऊ सदस्य दुर्घटनाग्रस्त होकर विकलांग हो गए हैं या फिर मौत का शिकार हो चुके हैं, लेकिन उनके आश्रितों को मुआवजे के रूप में एक नया पैसा तक नसीब नहीं हो पाता। सरकार के तमाम दावों के बावजूद दिहाड़ी मजदूर बदहाली में जीने को मजबूर है। दिसंबर 2005 में दिहाड़ी मजदूरों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से इस बात की जरूरत महसूस होने लगी है कि इन मजदूरों के लिए भी अलग से एक कानून बनाया जाए, ताकि किसी अनहोनी के घटने पर उनके आश्रितों को भूखे न मरना पड़े। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि श्रमिक मुआवजा कानून-1923 के तहत दिहाड़ी मजदूर 'श्रमिक' की परिभाषा के तहत नहीं आते, इसलिए वे इस कानून के अंतर्गत मुआवजा पाने के हकदार नहीं हैं। दरअसल, 1986 में रामू पासी नामक मजदूर की काम के दौरान उंगली में चोट लग गई थी। इस पर उसने धनबाद की श्रम अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे 4001 रुपए का मुआवजा मिला। इस मुआवजे को कम बताते हुए उसने पटना उच्च न्यायालय में अपनी याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने श्रम अदालत के फैसले को सही ठहराया। इस पर उसने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई, जहां न्यायालय ने उसे मुआवजे का हकदार नहीं माना। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से हर साल करीब 22 लाख मजदूर मारे जाते हैं। इनमें करीब 40 हजार मौतें अकेले भारत में होती हैं, लेकिन भारत की रिपोर्ट में यह आंकड़ा प्रति वर्ष केवल 222 मौतों का ही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया में हर साल हादसों और बीमारियों से मरने वालों की तादाद 22 लाख से अधिक हो सकती है, क्योंकि बहुत से विकासशील देशों में सतही अध्ययन के कारण इसका सही-सही अंदाजा नहीं लग पाता। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक के मुताबिक कार्य स्थलों पर समुचित सुरक्षा प्रबंधों के लक्ष्य से हम काफी दूर हैं।

आज भी हर दिन कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से दुनिया भर में पांच हजार स्त्री-पुरुष मारे जाते हैं। औद्योगिक देशों, खासकर एशियाई देशों में यह संख्या ज्यादा है। रिपोर्ट में यह भी जानकारी दी गई है कि विकासशील देशों में कार्य स्थलों पर संक्रामक बीमारियों के अलावा मलेरिया और कैंसर जैसी बीमारियां जानलेवा साबित हो रही हैं। यह बताने की जरूरत नहीं कि हमारे कार्य स्थल कितने सुरक्षित हैं? ऊंची इमारतों पर चढ़कर काम कर रहे मजदूरों को सुरक्षा बेल्ट तक मुहैया नहीं कराई जाती। पटाखा फैक्ट्रियों, रसायन कारखानों और जहाज तोड़ने जैसे कामों में लगे मजदूर सुरक्षा साधनों की कमी के कारण हुए हादसों में अपनी जान गंवा बैठते है। भवन निर्माण के दौरान मजदूरों के मरने की खबरें आए दिन अखबारों में छपती रहती हैं। इस सबके बावजूद मजदूरों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। दरअसल, देशी मंडी में भारी मात्रा में उपलब्ध सस्ता श्रम विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में पैसा लगाने के लिए आकर्षित करता है। साथ ही श्रम कानूनों के लचीलेपन के कारण भी वे मजदूरों का शोषण करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरना चाहते है। कुछ अर्थशास्त्री मानते है कि मजदूरी और उनको दी जाने वाली सुविधाएं बढ़ती हैं तो उद्योगपतियों को मिलने वाले फायदे का हिस्सा कम होगा। हमारे देश के उद्योगपति और ठेकेदार ठीक इसी नीति पर चल रहे है। फिक्की द्वारा कराए गए कंपनियों के अध्ययन के मुताबिक उदारीकरण से पहले पांच सालों में कंपनियों के शुद्ध मुनाफे में जितना इजाफा हुआ उससे आधी वृद्धि ही मजदूरी में हो पाई। यह कहना कतई गलत न होगा कि जैसे-जैसे आर्थिक सुधार की रफ्तार बढ़ती गई वैसे-वैसे मजदूरों की हालत भी बदतर होती गई। अब शायद केंद्र सरकार की पहल के बाद दिहाड़ी मजूदरों की हालत में सुधार आएगा और वे आजीविका कमाने के साथ-साथ अपनी सुरक्षा के प्रति भी आश्वस्त हो सकें।




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