केंद्र सरकार संभवत: अपना आखिरी बजट पेश कर चुकी है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि संप्रग सरकार को काम करने का समय नहीं मिला। यह सरकार जब आई थी तो न्यूनतम साझा कार्यक्रम के जरिये उसने जनता से वायदा किया था कि सेहत पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के एक प्रतिशत से बढ़ाकर दो से तीन प्रतिशत तक ले जाया जाएगा। सरकार का दूसरा वायदा था कि जीवन रक्षक दवाओं की कीमत पर नियंत्रण रखा जाएगा, लेकिन क्या ये दोनों वायदे पूरे हुए? सीधा जवाब है-नहीं। सेहत पर सरकार के खर्च का अनुपात अब भी उतना ही है जितना इस सरकार के पहले बजट के समय था। 354 जीवनरक्षक दवाओं पर नियंत्रण लागू करने का सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश भी लागू नहीं हो सका। भारत दुनिया के उन चंद देशों में है जहां सेहत पर सरकार का खर्च कम और लोगों का ज्यादा है। श्रीलंका जैसे देश में भी सेहत पर सरकारी और निजी खर्च लगभग बराबर है। यूरोपीय देशों में सेहत पर लगभग सारा खर्च सरकार ही करती है। पूंजीवादी व्यवस्थाएं भी सेहत के मामले में इसी नियम से चलती है।
विकसित देशों में एक अपवाद अमेरिका का है जहां सेहत पर निजी खर्च सरकारी खर्च से लगभग डेढ़ गुना है, लेकिन वहां लोगों की आमदनी आम भारतीयों से कई गुना ज्यादा है। प्रधानमंत्री की सलाहकार समिति ने एक रिपोर्ट में बताया है कि भारत में सेहत पर सरकारी खर्च से चार गुना खर्च निजी तौर पर लोग कर रहे है। भारत जैसे देश में जब सरकार सेहत पर कम खर्च करती है तो वह आबादी के बड़े हिस्से को बीमारियों से मरने के लिए या उनके हाल पर छोड़ देती है। बड़े शहरों में निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च इतना है कि गरीब की तो छोड़िए,मध्यम वर्ग के लोगों तक की हालत बिल चुकाने में खराब हो जाती है। संप्रग के घटकों और वाम दलों में इस पर आम सहमति रही है कि सेहत पर सरकारी खर्च बढ़ाने की जरूरत है, लेकिन इस दिशा में अब तक कुछ भी नहीं हुआ है। इस साल के बजट की पूरी दिशा स्वास्थ्य को लेकर सरकार की जिम्मेदारियों से मुंह चुराने की है। मिसाल के तौर पर केंद्रीय कर्मचारियों के लिए चल रही योजना सीजीएचएस में पिछले साल का वास्तविक खर्च 399 करोड़ रुपये था। इस साल 369 करोड़ रुपये ही रखे गए है। लोगों की सेहत की जिम्मेदारी से हाथ खींचने वाली सरकार एक ओर सस्ता इलाज करने वाले सरकारी अस्पतालों का बजट कम कर रही है वहीं चुनिंदा मेट्रो शहरों के अलावा कहीं भी खोले जा रहे निजी अस्पतालों को पांच साल की टैक्स छूट दे रही है। इसका असर यह होगा कि गैर मेट्रो शहरों में भी स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हो जाएंगी, साथ ही सरकारी क्षेत्र के डाक्टरों का पलायन निजी अस्पतालों की ओर होगा।
दवाओं की कीमत एक और क्षेत्र है जहां सरकार लोगों को राहत दे सकती थी। इस मामले में राजनीतिक आम सहमति और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है। अभी 74 जीवनरक्षक दवाएं ही ऐसी है जिन पर प्राइस कंट्रोल लागू होता है। यह लिस्ट 13 साल पुरानी है और इसमें कई दवाएं तो ऐसी हैं जिनका अब इस्तेमाल भी नहीं होता। प्राइस कंट्रोल का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और कोर्ट ने मार्च 2003 के आदेश में जीवनरक्षक दवाओं को प्राइस कंट्रोल के दायरे में लाने का आदेश दिया, लेकिन सरकार ने इस मामले को अब तक लटकाए रखा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल के लिए सरकार ने जुलाई 2004 में फार्मा एडवाइजरी फोरम बनाया। फोरम की रिपोर्ट आने में दो साल बीत गए। 2006 में रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने फार्मा पालिसी का ड्राफ्ट बनाकर कैबिनेट भेजा, जिसमें 354 दवाओं को प्राइस कंट्रोल के दायरे में लाने की सिफारिश की गई, लेकिन दवा कंपनियों को इस पर ऐतराज था। जनवरी 2007 में कैबिनेट ने इस पालिसी पर विचार किया और ये मामला मंत्रियों के समूह के पास भेज दिया गया। इस समूह की कई बैठकें हो चुकी है, पर इस बारे में कोई फैसला नहीं किया गया। दवा नीति पर फैसला न लेने से जहां दवा कंपनियों को फायदा हो रहा है वहींमरीजों और उनके परिवार वालों की जेब कट रही है। दवा की कीमत को बाजार के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि किसी और उत्पाद की तरह आप बाजार में दवा का सबसे सस्ता या अच्छा ब्रांड नहीं खरीदते। आप वही दवा खरीदते है जो डाक्टर के पर्चे में लिखी होती है। डाक्टर के पर्चे में उसी ब्रांड का नाम होता है जिसकी मार्केटिंग सबसे जोरदार तरीके से होती है,क्योंकि हर ब्रांड में केमिकल तो समान होता है। दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच ब्रांड प्रमोशन का खेल जगजाहिर है, पर इसे रोकने के लिए अब तक कोई पहल नहीं हुई है। कई देशों में डाक्टर की पर्ची पर ब्रांड की जगह केमिकल का नाम होता है और मरीज के पास यह चुनने की आजादी होती है कि वह किस ब्रांड की दवा खरीदे? इस मामले में राहत के लिए कृपया संप्रग सरकार की ओर मत देखिए।
[दिलीप मंडल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं]