
पिछले महीने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा प्रकाशित कराकर पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम से उसका विमोचन कराया और इस माह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह ने बातचीत के आधार पर अपने जीवन के कुछ अंशों को सार्वजनिक किया। ऐसा लगता है कि आडवाणी को आत्मकथा लिखने की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि उन्हें अपने सार्वजनिक जीवन के बारे में अपने साथियों को कुछ सफाई देनी थी। कुछ वर्ष पूर्व जब वह पाकिस्तान के दौरे पर जिन्ना की मजार से लेकर अपने पैतृक आवास तक गए तो उन्हे बरबस अपने बाल्य जीवन की याद आई। स्वाभाविक था कराची के होने के नाते उनमें मोहम्मद अली जिन्ना के प्रति प्रेम पैदा हुआ। उन्हें पाकिस्तान निर्माण के बाद वहां की संविधान सभा में जिन्ना द्वारा दिए गए भाषणों की याद आई। उनके पंथनिरपेक्ष विचारों का उन्हे ध्यान आया। फिर अपनी जन्मभूमि पर दूसरे देश की सरकारी कृपा से जाना संभव हुआ था तो उस देश के राष्ट्रपिता को अपशब्द थोड़े कहे जा सकते थे। शिष्टाचार वश उनके मुंह से निकले शब्दों पर उनके सहयोगी भड़क उठे। साथी इतना भड़के कि उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद गंवाना पड़ा। कहीं नेता विरोधी दल का पद और प्रधानमंत्री के रूप में दावेदारी भी न खत्म हो जाए, इसलिए सफाई में किताब लिखना आडवाणी के लिए आवश्यक था।
आडवाणी ने किताब क्या लिख दी, जिन्ना विवाद से परे अनेक विवाद उठ खड़े हुए। जिन्ना भूत से छुट्टी मिली तो कंधार की आग में झुलसने लगे। जीवनी लेखक का संकट है कि कोई करीबी लिखता है तो उसमें भाव भक्ति होती है, कमजोर पक्ष सामने नहीं आते। सभी आत्मकथा लेखकों में गांधीजी जैसा नैतिक बल कहां कि अपने जीवन की कमजोरियों को भी उजागर कर सकें। राजनेता अपनी जीवनी आत्मकेंद्रित होकर लिखते हैं, जिससे अपने दल, आंदोलन अथवा राजनीति के शलाका पुरुष के रूप में प्रदर्शित हो सकें। आडवाणी की किताब उनके 66 वर्षो के संघ परिवार के साथ नजदीकी संबंधों की यादगार है। इसे जिन्ना भूत को शांत करने का टोटका भी माना गया। यह पुस्तक संघ के वैचारिक पितामह एमएस गोलवलकर के साथ 60 वर्ष पुराने संबंध और उनके व्यक्तित्व व विचार की छाप का इतिहास है। जनसंघ के वैचारिक मार्गदर्शक पं. दीनदयाल उपाध्याय के परोसे विचारों के जलपान की झांकी है और 1957 से ही अटल बिहारी वाजपेयी के संसदीय व्यक्तित्व के उभार में अपने को होम कर देने का वृतांत है। उन्होंने मेट्रोपोलिटिन काउंसिल में प्रवेश के साथ संसदीय जीवन आरंभ होने की कहानी भी कही है। वैसे संसदीय जीवन ही उनके कार्यकर्ता जीवन के विनाश की गाथा है। संसद से उन्हें इतना प्रेम है कि जिस राज्य से भाजपा उन्हें राज्यसभा में भेजने में समर्थ हो, उनका निवास का पता उसी राज्य में बदल जाता है। उनके राजनीतिक जीवन का चरमोत्कर्ष सोमनाथ से अयोध्या की राम रथयात्रा है, लेकिन उसका भी विचार प्रमोद महाजन से उधार लिया गया। वाजपेयी की सरकार का संचालन तो मानो स्वयं उन्होंने ही किया। ब्रजेश मिश्र व नरेन्द्र मोदी से जुड़े विवादों और कंधार विमान अपहरण के मामले में आतंकवादियों की रिहाई से पल्ला झाड़ लेना इस बात का संकेत है कि अच्छाई मेरे खाते में बुराई दूसरों के कारण। आत्मकथा लेखक के इस दोष से आडवाणी उबर नहीं सके। कुल मिलाकर पुस्तक उनकी तस्वीर बनाने के बजाय बिगाड़ गई।
अर्जुन सिंह तो विवादों में ही फलने-फूलने की अभ्यस्त रहे है। जब तालाब का पानी स्थिर हो तो पत्थर उछाल दो। 1960 में पहली बार जवाहर लाल नेहरू से मिले। यह नहीं लिखते हैं कि 1957 में किस पार्टी के सहयोग से विधानसभा में पहुंचे थे? 1952 में उनके पिता को विंध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी से नेहरू जी ने क्यों निकाला था? उन्होंने अपनी पूरी दास्तान नेहरू-गांधी परिवार की प्रशंसा में गुजार दी। वह केवल इंदिरा भक्त नहीं रहे, बल्कि संजय गांधी के प्रति भी स्वामिभक्त रहे। उनका आकलन है कि नेहरू-गांधी परिवार स्वामिभक्तों का चयन करने में कभी गलती नहीं करता। उन्हे ध्यान नहीं रहा कि आज के गांधी परिवार के उत्ताराधिकारियों के लिए चिढ़ने का बड़ा नाम संजय गांधी है। उनका भक्त सोनिया, प्रियंका का प्रिय कैसे हो सकता है? अर्जुन सिंह ने जरूर सोचा होगा कि स्वामिभक्ति की अंतहीन कहानी के बावजूद वह दरबारियों में पीछे ही क्यों होते गए? उन्हे आकलन नहीं था कि नटवर सिंह जैसा परिवार भक्त तत्क्षण परिवार से बाहर कर दिया जाएगा। पुराने दरबारी यह नहीं देख सके कि नेहरू-गांधी परिवार अपने ऊपर संकट आने पर किसी स्वामिभक्त का बलिदान करके ही ग्रहदशा ठीक करता है। वीके कृष्णमेनन से लेकर वीपी सिंह तक के बलिदान की अंतहीन दास्तान है।
अर्जुन सिंह को यह बात हमेशा परेशान करती है कि नरसिंह राव की दो भुजाएं-पी. चिदंबरम और मनमोहन सिंह सोनिया के दरबार में सबसे आगे हो गए। राव को गांधी परिवार का प्रतिद्वंद्वी साबित करने के लिए 10वीं लोकसभा के अंतिम सत्र में तीन बार अर्जुन सिंह ने राजीव गांधी की हत्या का सवाल बहस के लिए उठाया और यह साबित करने की कोशिश की कि राव सरकार हत्यारों को सजा दिलाने में ढिलाई बरत रही है। उन्होंने सोनिया गांधी को शक्ति देने के लिए समानांतर कांग्रेस खड़ी करने का प्रयास किया, फिर भी भक्ति मंजूर नहीं हुई और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बना दिए गए। शायद यही वजह थी कि लिखत-पढ़त में खानदान की सेवा का इतिहास सामने लाना जरूरी था। यह समझ से परे है कि आखिर उत्ताराधिकारी को अभी से प्रधानमंत्री बनाने की बात बड़े लोगों को नागवार क्यों गुजरी? अब अर्जुन सिंह यह कह रहे हैं कि यह मेरी आत्मकथा नहींहै, बल्कि वह अपनी आत्मकथा खुद लिख रहे हैं। मेरी प्रार्थना है कि अर्जुन सिंह उस इतिहास को भी लिखें कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद उनके परिवार पर अंग्रेज शासकों की कृपा कैसे हुई? यह भी कि 1985 के बाद गांधी परिवार के प्रति पूर्ण निष्ठाभाव रखने के बावजूद उन्हें दरबारियों में अगली कतार की कुर्सी क्यों नहीं मिली?
निजी फायदे के लिए लिखी गईं आत्मकथाएं न तो साहित्य को समृद्ध करती हैं, न पाठकों के मन में राजनेताओं के प्रति आदर का भाव जगा पाती हैं। व्यस्त राजनेताओं को फालतू लेखन में स्याही और समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। डा. मुरली मनोहर जोशी ने बड़ी नेक सलाह दी है कि राजनेताओं को राजनीति से संन्यास लेने के बाद ही आत्मकथा लिखनी चाहिए। राजनीति में फैली चाटुकारिता से वैसे ही समाज पीड़ित है, उसका निरंतर जाप नेताओं के प्रति घृणा का भाव प्रस्तुत करता है। शायद इसीलिए मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने 'इंडिया विंस फ्रीडम' लिखी तो अपनी वसीयत में लिखा कि मेरी मृत्यु के 10 साल बाद इसका प्रकाशन हो। उन्होंने अपने सहकर्मियों के प्रति कड़वी बातें लिखी थीं, लेकिन इतिहास की सच्चाई थी तो काफी दिलचस्पी से लोगों ने उसे पढ़ा। आडवाणी और अर्जुन सिंह की किताबों में इतिहास का विवरणात्मक खंड भी नहीं है। नि:संदेह त्याग, संघर्ष और बलिदान की कहानी ही नई पीढ़ी को प्रेरणा देती है, चाटुकारिता का अंतहीन अध्याय किसी को मुग्ध नहीं करता। इस देश के दो बड़े दलों के बड़े नेताओं ने किताब लिखने की जल्दबाजी में कुछ खोया है, पाया कुछ नहीं।
[आडवाणी और अर्जुन सिंह की आत्मकथा में कुछ भी आकर्षक नहींदेख रहे हैं मोहन सिंह]