कांग्रेस का नेतृत्व संकट

 
May 14, 11:59 pm

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा मनमोहन सिंह को देश का सबसे 'कमजोर प्रधानमंत्री' करार देने की प्रतिध्वनि अब कांग्रेस और संप्रग घटकों में भी सुनाई पड़ने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में सफलता के लिए किसी और को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना चाहिए। वे जिस 'किसी और' को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहते हैं उसके लिए राहुल गांधी से अधिक उपयुक्त शायद ही कोई और हो। इसीलिए जहां कांग्रेस अध्यक्ष और उनके सलाहकार एक योजना के तहत राहुल गांधी को लोकप्रिय बनाने की योजनाओं पर आगे बढ़ रहे हैं वहीं2004 में सोनिया गांधी द्वारा खुद प्रधानमंत्री न बनकर मनमोहन सिंह का चयन किए जाने से आहत लोगों के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना वास्तव में अपने दबे हुए असंतोष को प्रकट करने का माध्यम है। सोनिया गांधी ने प्रवक्ता जयंती नटराजन से भले ही यह कहला दिया हो कि प्रधानमंत्री का पद रिक्त नहीं है और उन्हें स्वयं तथा राहुल गांधी को चापलूसी पसंद नहीं है, लेकिन हकीकत तो यही है कि कांग्रेस में 'चापलूसी' की पुरानी परंपरा है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह की हैसियत बनाने की दिशा में कांग्रेस ने कभी कोई पहल नहीं की। उनकी छवि दस जनपथ के आदेशों का पालन करने वाले के रूप में बनी हुई है। यह स्थिति तभी साफ हो गई थी जब हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने मनमोहन सिंह को रोहतक से लोकसभा उपचुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया था और बदले में कांग्रेस नेतृत्व से फटकार खाई थी। तब मनमोहन सिंह मन मसोस कर रह गए थे और उन्हें असम से दोबारा राज्यसभा में आने को विवश होना पड़ा था। वह कार्यकाल पूरा करने वाले देश के ऐसे एकमात्र प्रधानमंत्री हैं जिन्हे उनकी पार्टी ने ही 'जन समर्थन' हासिल करने का अवसर प्रदान नहीं किया।

जनता से सीधा संबंध न होने के कारण ही शायद उनके भीतर का नौकरशाह अगड़ों के सहारे प्रगति का आकलन कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप देश भयावह महंगाई झेल रहा है। महंगाई दूर करने का प्रयास करने के बजाय सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पिछले दिनों इस बात का खुलासा हुआ था कि 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सोनिया गांधी के लिए सरकार बनाने का आमंत्रण पत्र तैयार करा लिया था, लेकिन उनके द्वारा मनमोहन सिंह का नाम सुझाए जाने पर दूसरा आमंत्रण पत्र तैयार किया गया। इससे दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। एक यह कि राष्ट्रपति ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल को प्रधानमंत्री पद के लिए अनुपयुक्त नहीं माना। दूसरा यह कि सोनिया गांधी ने हालात का जायजा लेकर इस दायित्व को स्वीकार नहीं किया। कांग्रेसजनों की निरंतर मांग पर सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को पार्टी का महासचिव बना दिया और राहुल गांधी ने दायित्व संभालने के दूसरे ही दिन प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन देकर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना देश के सभी जनपदों में लागू करने का 'आग्रह' किया। प्रधानमंत्री ने दूसरे ही दिन तत्संबंधी घोषणा कर दी, जिससे ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद भी चकित रह गए। इसके बाद किसी पत्रकार से अर्जुन सिंह ने कहा कि राहुल गांधी युवा है, उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने में क्या बुराई है। यह अर्जुन सिंह की पहल नहीं, बल्कि माहौल बनाने का सुनियोजित ढंग है। महत्वपूर्ण फैसले लेने से पहले कांग्रेस नेतृत्व चर्चा छेड़ कर उसके बारे में जनमत तैयार करना चाहता है। एक वर्ष से इस मांग को नजरअंदाज किया जा रहा था कि राहुल गांधी को पार्टी का महासचिव बनाया जाए। जब मामला पूरी तरह पक गया तभी सोनिया गांधी ने उन्हें दायित्व सौंपा।

भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी के नाम को विधिवत प्रचारित करने के लिए वर्तमान विवाद वस्तुत: गांधी परिवार की सोची-समझी रणनीति का ही हिस्सा है। स्वयं सोनिया गांधी ने इस बात को हवा दी थी कि अप्रैल के मंत्रिमंडल विस्तार में राहुल गांधी ने मंत्री पद स्वीकार करने से मना कर दिया। ऐसा राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ाने के अभियान के तहत किया गया। दलितों के घर भोजन करने, उनकी चारपाई पर सोने, उनके साथ धरना देने आदि से राहुल गांधी एक जननायक के रूप में स्थापित हो रहे है। हां, यह जरूर है कि इससे उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के माथे पर चिंता की लकीरें पड़ रही हैं। कुछ लोग गरीबों से मेलमिलाप के इस अभियान को चुनावी स्टंट के रूप में भी देख रहे है, लेकिन जब चुनावी सफलता के लिए समाज को विखंडित करने के अभियान चलाए जा रहे हैं तो समाज में समरसता को बढ़ावा देने वाली ऐसी पहल की तो सराहना की ही जानी चाहिए-भले ही उसका उद्देश्य चुनाव के लिए समर्थन जुटाना हो। आखिर कोई अन्य नेता गरीबों के बीच में क्यों नहीं जा रहा है? जो नेता गरीबों के बीच से ही शीर्ष पर पहुंचे हैं वे पांच सितारा संस्कृति के अभ्यासी हो चुके है।

ऐसे में अगर राजीव गांधी किसी गरीब के घर पर खाना खाकर खुले आसमान के नीचे सोते हैं तो इसकी सराहना की जानी चाहिए। ये आरोप खीझ मिटाने वाले हैं कि ऐसा करने के बाद राहुल गांधी विशेष प्रकार के साबुन से स्नान कर अपने को शुद्ध करते है। राहुल गांधी यदि इस अभियान को जारी रखते है तो निश्चय ही इससे कांग्रेस को बल मिलेगा। अभी तो विरोधी बौखला रहे हैं और वे जितना बौखलाएंगे कांग्रेस को उतना ही लाभ मिलेगा। जहां तक राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की बात है तो नेहरू-गांधी परिवार में सोनिया गांधी ही अपवाद हो सकती है जिन्होंने अवसर मिलने पर दायित्व संभालने का साहस नहीं दिखाया। राहुल गांधी ऐसी भूल नहीं करेगे। कांग्रेस अगले चुनाव में किसी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करे या न करे, पर इतना तय है कि वह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश नहीं करेगी।

[राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने की कांग्रेस की कोशिशों का निहितार्थ तलाश रहे हैं राजनाथ सिंह सूर्य]




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(0) वोट का औसत

average:0
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • ज़रा हटके
    Add to My Yahoo! xml
  • संपादकीय
    Add to My Yahoo! xml
  • दृष्टिकोंण
    Add to My Yahoo! xml
  • जागरण यात्रा
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2008 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित