पाक में नया खलनायक

 
May 15, 11:53 pm

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संबंध खराब होने के कयास पहले ही लगाए जा रहे थे। पिछले साल परवेज मुशर्रफ द्वारा बेदखल किए गए जजों की बहाली को लेकर दोनों दलों में सहमति नहीं बन पाई। कई सप्ताह से यह जाहिर हो रहा था कि जजों के मामले पर पीएमएल (एन) का नजरिया पीपीपी से बिल्कुल अलग है। पीएमएल (एन) ने चुनाव प्रचार के दौरान जजों की बहाली के मुद्दे को जमकर उछाला, जबकि पीपीपी ने अपने दृष्टिकोण में चौकसी बरती। उसने न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने को वरीयता देने की बात की। पीपीपी का जोर एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की बहाली पर नहीं रहा। फिर भी, यह दु:खद है कि जजों की बहाली के मुद्दे पर पीएमएल ने पीपीपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से अपने मंत्रियों को वापस बुलाने का निर्णय लिया। नए और एकजुट लोकतांत्रिक तंत्र की कहानी केवल छह सप्ताह ही चल सकी। कुछ लोगों का मानना है कि इस असफलता का कारण पीपीपी का घोर गैर-जिम्मेदाराना रवैया है, जबकि दूसरों का कहना है कि राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने गठबंधन को बड़ी सफाई से क्लीन बोल्ड कर दिया है। परवेज मुशर्रफ के चुनौती भरे दांव गठबंधन झेल नहीं पाया। इस तरह के आरोप भी हैं कि पीपीपी के कुछ तत्वों ने मुशर्रफ की तरफदारी की और इससे हर तरफ संदेह के बादल छा गए। जैसा कि पाकिस्तान में होता है, यह अनिश्चित है कि पूरी सच्चाई कभी सामने आ पाएगी, पर कुछ चीजें साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। पिछले नवंबर में आपातकाल के दौरान मुशर्रफ द्वारा बेदखल किए गए जजों की बहाली निकट भविष्य में संभव नहीं लगती। यदि ऐसा होता है यह वकीलों और जनता पर कुठाराघात होगा, जिन्होंने उनकी तरफ से जोरदार संघर्ष किया था।

जजों की बहाली से इनकार कर पीपीपी मुशर्रफ के पाले में जाती दिखाई पड़ रही है। पार्टी खुद कहती है कि वह उन्हें वापस लाने की इच्छुक तो है, लेकिन इस तरीके से कि टकराव और संकट पैदा न हो। यह प्रश्न भी विचारणीय है कि भविष्य में यह मसला कैसे हल किया जाएगा? कहा जा रहा है कि कुछ सीनेटर और पाकिस्तान के ऊपरी सदन के सदस्य उनकी वापसी का प्रस्ताव पेश कर सकते हैं। वकील और जनता जजों की बहाली को लेकर फिर से जोरदार आंदोलन छेड़ सकती है। वकील अपनी योजनाओं का खुलासा 17 मई तक कर देंगे। आम लोग भी, जिनका किसी आंदोलन से वास्ता नहीं, इसे लोकतांत्रिक शक्तियों से धोखा मान रहे हैं। उनमें आक्रोश भरा है और वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। संसद के बाहर विरोध प्रदर्शनों की बातें हो रही है। अगर इस्लामाबाद में वकीलों और उनके समर्थकों पर बल प्रयोग किया जाता है तो सरकार और पीपीपी के कार्यकारी अध्यक्ष जरदारी के सामने बड़ी विकट स्थिति पैदा हो जाएगी। 18 फरवरी के चुनाव के बाद से पीपीपी मामले को लटका रही है और निर्णायक फैसले को टालने का प्रयास कर रही है, किंतु यह मसला लोगों के दिलो-दिमाग में इस कदर छाया हुआ है कि इस तरह के हथकंडे असफल होने ही थे। यद्यपि पाकिस्तान के लोग ऐसे संकट झेल रहे हैं जो सीधे-सीधे उन्हें ज्यादा प्रभावित करते हैं, जैसे बढ़ती महंगाई, फिर भी उनके मानस पटल पर जजों के मामले की छाप अधिक गहरी है। मीडिया बड़े मनोयोग से जजों का तब से साथ दे रहा है जबसे उन्हें बेदखल किया गया। बेदखल मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी को जनता के मन-मस्तिष्क में बैठाने और उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतीक के रूप में स्थापित करने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है। आसिफ अली जरदारी ने इस मुद्दे पर अपने वायदे तोड़ दिए हैं और पाकिस्तान की जनता की निगाह में उनकी छवि खलनायक की बन गई है-एक ऐसा खलनायक, जिसने लोकतंत्र विरोधी शक्तियों से हाथ मिला लिया है और जिसने उन लोगों के साथ विश्वासघात किया है जिन्होंने उनकी पार्टी को वोट दिया है।

पीपीपी यह प्रदर्शित करती रही है कि वह जजों की बहाली के प्रति प्रतिबद्ध है, किंतु संसद में प्रस्ताव पारित करने में कुछ तकनीकी और कानूनी अड़चनें हैं, जबकि पीएमएल इस मामले को संसद में प्रस्ताव पारित कर सुलझाना चाहती है। पीपीपी का कहना है कि इस प्रकार के प्रस्ताव पर उच्चतम न्यायालय में बेदखल किए गए जजों के स्थान पर नियुक्त जज स्थगन आदेश दे सकते हैं और इससे संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है। हालांकि अपने स्पष्टीकरण के बावजूद पीपीपी की साख गिर गई है। इसका एक कारण यह भी है कि पीपीपी पर गुप्त रूप से राष्ट्रपति मुशर्रफ से साठगांठ करने का संदेह जताया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि पीपीपी और पीएमएल की बीच दुबई और फिर लंदन में हुई बातचीत का मसौदा गोपनीय रखा गया, जिससे यह संदेश गया कि गुपचुप कोई खेल खेला जा रहा है। बेदखल मुख्य न्यायाधीश पर जरदारी ने जबानी हमला बोल दिया कि उन्होंने उन्हें तब कोई राहत नहीं दी जब वह जेल में थे। इससे हालात और बिगड़ गए। लगता है कि पीपीपी नेता सिद्धांतों पर अमल करने के बजाय व्यक्तिगत दुश्मनी निकालना चाहते हैं। पीएमएल (एन) मंत्रियों द्वारा मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद भी गठबंधन सलामत है। फिलहाल, पीपीपी और पीएमएल (एन) इस बारे में सतर्क हैं कि उनकी राह जुदा न हो। गठबंधन से निर्णायक जुदाई से पंजाब प्रांत में पीएमएल (एन) की सरकार खतरे में पड़ जाएगी। यद्यपि वहां पीएमएल (एन) को सर्वाधिक सीटें मिली हैं, किंतु सरकार बनाने के लिए उसे पीपीपी के समर्थन की बैसाखी थामनी पड़ी। जहां तक पीपीपी का सवाल है, अगर वह पीएमएल (एन) से अलग हो जाती है तो उसे मुशर्रफ और मुत्तोहिदा कौमी मूवमेंट के त्रिकोण में फंसना पड़ेगा। पार्टी इस स्थिति से बचना चाहती है, क्योंकि इससे उसकी लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में साख गिर जाएगी। फिलहाल तो बेदखल जजों और पाकिस्तानी सरकार का भविष्य अधर में लटका है।

[कैमिला हयात: लेखिका द न्यूज, लाहौर की पूर्व संपादक हैं]




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(0) वोट का औसत

average:0
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • ज़रा हटके
    Add to My Yahoo! xml
  • संपादकीय
    Add to My Yahoo! xml
  • दृष्टिकोंण
    Add to My Yahoo! xml
  • जागरण यात्रा
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2008 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित