क्यों बोझ बनी खेती

 
May 15, 11:53 pm

भारत में हरित क्रांति के जनक एवं राष्ट्रीय कृषि आयोग के अध्यक्ष डा. एमएस स्वामीनाथन के अनुसार विश्व में सबसे जोखिम भरा धंधा कृषि है। इसलिए कृषि प्रधान भारत में कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर मद्रास इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर के.नागराज बताते हैं कि 1997 से 2005 के बीच कर्ज में दबे करीब 1.5 लाख किसान आत्महत्या कर चुके थे। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षो में कर्ज में डूबे करीब एक लाख चालीस हजार किसानों ने आत्महत्या की है। अनुमान के मुताबिक प्रतिदिन औसतन 45 किसान आत्महत्या करते हैं। हाल में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कांतिलाल भूरिया ने लोकसभा में बताया कि 2004 से जून 2007 तक देश के विभिन्न इलाकों में दस हजार 185 किसान आत्महत्या कर चुके है। इनमें 3822 महाराष्ट्र में विदर्भ के थे। महाराष्ट्र में 2007 में 1985, 2006 में 2355, 2005 में 595 किसानों ने जान गंवा दी। पिछले चार वर्ष में विदर्भ के सिर्फ छह जिलों में 4453 किसान आत्महत्या कर चुके है। केंद्रीय वित्ता मंत्री द्वारा बजट में किसानों के लिए साठ हजार करोड़ रुपये की ऋण माफी की घोषणा करने के बाद भी विदर्भ में 15 अप्रैल, 2008 तक 120 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इससे इस दावे की हवा निकल गई कि ऋण माफी की घोषणा से आत्महत्याएं रुकेंगी। विदर्भ जैसे हालात बुंदेलखंड में भी हैं। बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा बुंदेलखंड भुखमरी के चलते दूसरा कालाहांडी बन चुका है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के अध्येता एसएस गिल का कहना है कि मुझे ऐसे किसान से मिलवाओ जिस पर एक लाख पचास हजार रुपये का कर्ज है। मैं आपको बता दूंगा कि वह निकट भविष्य में आत्महत्या कर लेगा। अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, पाला, शीतलहर, तापलहर आदि प्राकृतिक विपदाओं या भावों की मंदी की आकस्मिक आपदा के कारण फसल बर्बाद होने पर कर्ज में छटपटाते किसान के लिए आत्महत्या ही दर्द से निजात पाने का सहज रास्ता है। यक्ष प्रश्न यह है कि कब तक खेतों में खुदकुशी की फसल उगती रहेगी? डा. राधाकृष्ण आयोग के अनुसार 2003 तक किसानों पर एक लाख बारह हजार करोड़ रुपये का कर्ज था। अब यह बढ़कर तीन लाख अस्सी हजार करोड़ हो गया है। नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े दर्शाते है कि वर्ष 2003 में आंध्र प्रदेश में 82 फीसदी खेतिहर परिवार कर्जदार थे, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 48.6 फीसदी किसान कर्जदार हैं। पंजाब मे 65.4 व हरियाणा में 53.1 फीसदी किसान कर्जदार पाए गए है। पंजाब के प्रत्येक किसान पर औसतन 45 हजार रुपये कर्ज है। एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक 56 फीसदी किसानों ने महाजनों से ऋण लिया है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक कर्जदारों किसानों में से 61 फीसदी की जोत एक हेक्टेयर से भी कम है। इन किसानों ने कुल ऋण में 57.7 फीसदी कर्ज संस्थागत संस्थाओं से लिया, जबकि शेष 42.3 फीसदी कर्ज महाजनों, व्यापारियों या रिश्तेदारों व दोस्तों से। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 26 फीसदी किसान साहूकारों से कर्ज लेते है। गैर सरकारी आंकड़ों को देखें तो यह संख्या पचास फीसदी तक पहुंचती है। कुछ किसान तो चार से पांच रुपये सैकड़ा पर कर्ज लेते है। बदले में साहूकार घर, जमीन और अन्य संपत्तिगिरवी रख लेते है। कर्ज में डूबे किसानों में 80 फीसदी सीमांत किसान है। साहूकारों, आढ़तियों से भारी-भरकम सूद पर कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान खुद को ठगा महसूस करते है।

प्रेमचंद की कहानी 'सवा सेर गेहूं' और उपन्यास 'गोदान' के होरी की तर्ज पर किसान कभी उऋण नहीं हो पाता। किसान खेती के अपने पेशे के कारण कर्जदार है। इस पेशे से पीढि़यों से उसे लगातार घाटा हो रहा है। वह अपना पेशा छोड़ नहीं पाता और बैंक और साहूकारों की बहियों से बाहर नहीं निकल पाता। औसत भारतीय किसान इसलिए तंगहाल है, क्योंकि एक तो कृषि उत्पादकता घटती जा रही है और दूसरे किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा। प्राय: उसके लिए लागत निकालना कठिन हो जाता है। ज्यादातर किसान खेती के आधुनिक तौर-तरीके नहीं अपनाते। जब वे अपने को सक्षम बनाने के लिए कर्ज लेते है तो फसल बर्बाद होने पर मुश्किल में फंस जाते है। चूंकि उन्हें रियायती दर से बैंक से कर्ज नहीं मिल पाता इसलिए वे सूदखोरों के चंगुल में फंस जाते हैं। फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए कितनी भी बड़ी राशि तब तक कारगर नहीं हो सकती जब तक किसान की आय नहीं बढ़ाई जाती। इसके लिए यह अनिवार्य है कि उपज बढ़े और उपज का दाम भी बढ़े।

[लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]




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