कई साधक और विद्वान अंतर्भास कहना ज्यादा ठीक समझते है तो कई अंत:प्रेरणा। कई पश्चिमी विचारक इसे मन के जरिए आया एक सहसा विचार मानते है तो कई इसे आत्मा से स्वत: स्फूर्त प्रेरणा मानते है, लेकिन अधिकतर आध्यात्मवेत्ता इसे परमात्मा की प्रेरणा मानते है। जिस तरह से गहन अंधकार में आकाश से एकाएक बिजली कौंध जाती है और क्षणभर में सारा दृश्य स्पष्ट और ज्ञेय हो जाता है उसी तरह से अंत:प्रेरणा में इस तरह का आत्मानुभव होता है, मनुष्य स्वयं ही स्वयं की सीमा को मानो अतिक्रमण कर जाता है। लंबे समय तक जिस समस्या का समाधान नहीं होता वह महज एक अंतर्भास की झलक से तत्काल हल हो जाता है। एक अंतर्आदेश अंतरानुशासन सा हृदय में कौंधकर मन में वैचारिक स्वरूप ग्रहण कर हमें इस प्रकार निर्देशित व उपदृष्ट करता है कि हम स्वयं ही चमत्कृत हो जाते है। प्रत्येक मनुष्य में अंतर्भास की क्षमता होती है। परंतु तार्किक मन का स्वभाव स्वयं को जटिलताओं में उलझा लेने का होता है। इसलिए वह न तो अंतर्भास को ठीक-ठीक पहचान सकता है और न पहचान की जाए तो आस्था को सहारा दे सकता है। तार्किक मन अपने बौद्धिक विश्वासों से बंधकर अंतर के क्षीण प्रकाश को उपेक्षित कर देता है।
अंत:प्रेरणा या अंतर्भास पर पश्चिमी दुनिया के तमाम विचारकों ने भी खुले दिल से विचार किया है। इसे न तो वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित किया जा सकता है और न तर्कसंगत ढंग से ही। यह विशुद्ध रूप से अंतक्रिया का विषय है। इसलिए इसे किसी प्रमाण के जरिए सीधे सिद्ध भी नहीं किया जा सकता है। हां, अंतर्भास के जरिए तमाम रहस्यों के बारे में जरूर जानकारी मिल जाती है। ऐसे सिद्ध पुरुष हैं जो तमाम घटनाओं का रहस्य अंत:प्रेरणा के जरिए खोलते देखे जाते है। उनकी बताई हुई तमाम बातें अक्षरश: सच साबित होती है। वेद में इसे 'अग्नि' नाम से संबोधित किया गया है। अग्नि की एक चिनगारी की तरह ही अंतर्भास की चिनगारी उभरती है। अध्यात्मविदों के अनुसार इस चिनगारी को श्रद्धा और ध्यान का सहारा न मिले तो वह स्वत: ही बुझ जाती है। इसे जानने के लिए साधना करनी पड़ती है। कठिन साधना के जरिए अंत:प्रेरणा के विषय में बहुत कुछ बताया जा सकता है।
[अखिलेश आर्य]