कर्नाटक में करीबी लड़ाई

 
May 16, 11:13 pm

कर्नाटक चुनाव के बारे में भविष्यवाणी के लिए किसी प्रख्यात ज्योतिषी की शरण में जाना पड़ेगा। अभी वहां मतदान के दो चरण बाकी हैं। एक समाचार चैनल द्वारा किए गए पहले सर्वेक्षण के अनुसार कांग्रेस स्पष्ट बहुमत के करीब पहुंच जाएगी, जबकि भाजपा को पराजय का मुंह देखना पड़ेगा। दूसरी ओर एक अन्य समाचार चैनल द्वारा किए गए एग्जिट पोल का अनुमान इसके ठीक विपरीत है। दोनों में से कौन सही है, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि कांग्रेस, भाजपा और जनता दल के बीच कड़े मुकाबले में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिल चुके हैं। शुरुआत में लग रहा था कांग्रेस और भाजपा में बराबर की टक्कर में कांग्रेस को हल्की सी बढ़त है, जबकि जनता दल पिछड़ कर तीसरे स्थान पर खिसक गया है, लेकिन पहले दौर के मतदान के बाद लगता है कि भाजपा कांग्रेस से आगे निकल गई है और जनता दल भी 35-40 सीटें निकाल सकता है। स्थिरता के लिए अनिश्चित वोट कांग्रेस या भाजपा में किसी की भी झोली में जा सकते हैं। कुल मिलाकर पहले दौर के बाद कयास यह है कि भाजपा 90-95 सीटें, कांग्रेस 75-80 और जनता दल (एस) 35-40 सीटों पर जीत हासिल कर सकते हैं। दूसरे दौर के मतदान के बाद ही स्थिति साफ होगी। इस चुनाव क्षेत्र में भाजपा का मजबूत आधार है और बसपा को मिलने वाले वोट कांग्रेस की सीटों पर मुसीबत ढा सकते हैं। इस बात से हर कोई सहमत है कि ये चुनाव सबसे अधिक महंगे साबित हो रहे हैं। जनता दल (एस) विशेष तौर पर 80 सीटों पर ही संसाधन झोंक रहा है। चुनाव का संचालन बड़ी कुशलता से हो रहा है। जनता दल (एस) के शीर्ष नेताओं की सभा में अच्छी-खासी भीड़ भी देखी जा रही है। ऐसा लगता है कि भाजपा और कांग्रेस को चकरघिन्नी बनाने के मामले का अधिक नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।

अब जब दूसरे दौर का मतदान भी हो चुका है तो अंतिम दौर के लिए भाजपा की ओर से लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार आदि बड़े नेता अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे तो कांग्रेस के चुनाव प्रचार के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी मोर्चा संभालेंगे। देवगौड़ा परिवार यह सुनिश्चित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेगा कि कांग्रेस और भाजपा बराबरी पर रहें और पिछली बार की तरह इस बार भी उसे कुर्सी का खेल खेलने का मौका मिल जाए। अगर कोई हैरतअंगेज घटना नहीं होती है तो कर्नाटक के परिणाम लोकसभा चुनाव में गठबंधन की रूपरेखा निर्धारित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ऐसा तब होगा जब कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगी। तब हाशिए पर बैठे बहुत से दल या नेता लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा गठबंधन का दामन पकड़ सकते हैं। यह तय है कि लोकसभा चुनाव से पहले तीन गठबंधन-संप्रग, राजग और तीसरा मोर्चा होंगे, लेकिन परिणाम आने के बाद केवल दो ही बचेंगे। बसपा, अन्नाद्रमुक और तेगलूदेशम राजग या तीसरे मोर्चे में से किसी भी तरफ जा सकते हैं। क्या कोई तृणमूल कांग्रेस, राजद, झारखंड मुक्ति मोर्चा, लोजपा, नेशनल कांफ्रेंस, जनता दल (एस), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, एमडीएमके और पीएमके आदि पार्टियों के गठबंधन की संभावनाओं के बारे में कयास लगा सकता है? कर्नाटक में कांग्रेस को लगने वाला झटका भविष्य में नए गठबंधन के द्वार खोल देगा। इन परिस्थितियों में हर किसी को अवसर भुनाने के लिए कमर कस कर तैयार रहना होगा। समझदार राजनेताओं को गठबंधन का चुनाव करने में दिक्कत पेश आती है। हमें रामविलास पासवान पर निगाह रखनी होंगी, जिनके पास कुल जमा दो सांसद हैं, फिर भी वह हर सरकार में केंद्रीय मंत्री बनने में कामयाब हो जाते हैं। जनता दल में रहने के बाद वह राजग और संप्रग में सत्ता सुख भोग चुके हैं। इसी प्रकार द्रमुक भी राजग और अब संप्रग सरकार में भागीदार है। साफ है कि वे अन्य पार्टियों की अपेक्षा रुझान को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। हम व्यक्तिगत कमियों, जैसे नैतिकता के आधार को समझ सकते हैं, लेकिन इसका प्रभाव कुछ सीटों तक ही सीमित है। पश्चिम बंगाल में माकपा को राज्यपाल गोपाल गांधी से परेशानी हो रही है। मेरा मानना है कि इस युग में राज्यपालों की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। यह ब्रिटिश राज का दुमछल्ला है। अगर राजनिवासों को सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित कर दिया जाए तो इससे अच्छी क्या बात होगी। तमाम राजनयिक, रिटायर्ड नौकरशाह और सैन्य अधिकारी दूसरों की तरह ही समय पर रिटायर हो जाएंगे और सरकारी खर्च में बढ़ोतरी नहीं करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं लगता कि कोई इस व्यवस्था को दुरुस्त करने का इच्छुक है। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सबको अपना दोष स्वीकार करना चाहिए। बिहार, झारखंड, गोवा और मेघालय में राज्यपालों की भूमिका सामने आ चुकी है। अगर कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति उभरती है तो यहां भी राज्यपाल गुल खिला सकते हैं।

इधर कुछ विचित्र घटनाएं घटी हैं। इनमें स्वास्थ्य मंत्री और जहाजरानी मंत्री से जुड़े मामले प्रमुख हैं। इसी तरह नंदीग्राम में जारी अशांति का मामला भी है। माकपा के लिए नंदीग्राम मुश्किल मोर्चा साबित हो रहा है। हर कोई जानता है कि संप्रग सरकार वाम दलों के समर्थन पर ही टिकी है और इनमें माकपा सबसे बड़ा दल है। वाम दलों की ही तरह केंद्र सरकार पर राजद, झामुमो, द्रमुक और पीएमके जैसे दलों का भी दबाव है। कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेश-निर्देश भी जारी किए गए, लेकिन लोग अपने-अपने पदों पर डटे हुए हैं। यह दु:खद है कि राज्यपाल राजनीतिक तंत्र के विस्तार मात्र बनकर रह गए हैं। राज्यपाल गोपाल गांधी एक अपवाद हैं। वह किसी भी राजनीतिक सत्ता के लिए दिक्कत पेश करेंगे ही, क्योंकि वह नैतिकता के समर्थक हैं। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस नंदीग्राम मुद्दे को भुनाएंगे। अगर जोर-जबरदस्ती का सहारा जाता है तो यह माकपा की भारी भूल होगी।

[कर्नाटक के विधानसभा चुनावों के नतीजों से राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधनों में बदलाव आता देख रहे है अरुण नेहरू]




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