
हमें इस बात का तनिक भी आभास नहीं है कि धर्मों के महान प्रवर्तक, जैसे महावीर, बुद्ध, जोराष्ट्र, राम, कृष्ण, ईसा मसीह, हजरत मोहम्मद या गुरु नानक कैसे लगते होंगे? उस जमाने में न तो कैमरे थे और न ही कोई अपना चित्र बनवाता था। उनकी मृत्यु के बहुत समय बाद कुछ कलाकारों ने उनकी कही बातों को आधार बनाकर अपनी कल्पना से उनके चित्र बना लिए। बाद में चित्रकारों और शिल्पकारों ने अपने पूर्ववर्तियों की तरह उनकी आकृतियां बनाई। मुझे कुछ आश्चर्य सा हुआ जब हरजीत एक सुबह मेरे पास किसी चरणजीत सिंह द्वारा बनाए गए गुरु गोविंद सिंह के आदमकद पोर्ट्रेट के संदर्भ में बताने आई। वह बहुत ही धार्मिक सिख है, होटल लि मेरेडियन में अपने दफ्तर जाने से पहले प्रत्येक सुबह गुरुद्वारा बंगला साहब के दर्शन करने जाती हैं। उन्होंने बताया कि यह कुछ अलग है। चित्रकार ने गुरु गोविंद सिंह को योद्धा के रूप में चित्रित नहीं किया था, जैसा कि बाकी लोग करते आए थे, बल्कि एक विद्वान और कवि के रूप में उन्हें प्रस्तुत किया है। आप उनकी रचनाएं अवश्य देखिए। वह बोलीं कि अपने होटल में इन चित्रों की प्रदर्शनी लगा रही हूं। यह सच है कि गुरु गोविंद सिंह हमेशा घोड़े की पीठ पर बैठे, एक हाथ में बाज पकड़े और दूसरे में तलवार उठाए दिखाए गए है। लोग यह भूल जाते है कि वह पंजाबी, बृज और फारसी के विद्वान भी थे। फारसी के लिखे 'जफरनामा' शीर्षक के ग्रंथ में उन्होंने बताया है कि वह हथियार उठाने के लिए क्यों मजबूर हुए? वह लिखते हैं कि जब सभी उपाय आजमाए जा चुके हों, सभी रास्ते नाकामयाब हो जाएं तो यही उचित है कि तलवार को म्यान से बाहर निकाल लिया जाए। फिराक गोरखपुरी ने दो पंक्तियों में यह बात कही है:
ख्वाब को जज्बाए बेदार दिए देता हूं
कौम के हाथ में तलवार दिए देता हूं।
सैनिक काव्य के अतिरिक्त उन्होंने पंजाबी में कुछ बहुत ही मन को छूने वाली कविताएं लिखी है, जिन्हें पढ़कर आंखों से आंसू बहने लगते है। उनकी हत्या केवल 42 वर्ष की आयु में कर दी गई थी। हरजीत ने अपनी प्रदर्शनी में दिल्ली के सिख समाज की जानी-मानी हस्तियों को बुलाया था। धनी सरदार आमतौर पर अपने संगमरमरी बंगलों और विदेशी गाड़ियों के लिए ज्यादा जाने जाते हैं, न कि पुस्तकों अथवा चित्रकारी के लिए। मुझे संदेह था कि चरणजीत को कोई खरीददार भी मिल सकेगा, लेकिन चमत्कार होते ही रहते है। उनकी पेंटिंग हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में बिकी। प्रदर्शनी में उनकी सभी पेंटिंग हाथों-हाथ बिक गई।
[शायर मजाज]
जामिया मिलिया के उपकुलपति स्व. प्रोफेसर मुजीब अक्सर मेरे घर आया करते थे। उनकी संगत बहुत ही बढि़या होती थी, क्योंकि वह अंग्रेजी, जर्मन और उर्दू के जबरदस्त विद्वान थे। वह उर्दू नगमें गाना पसंद करते थे। उनके पसंदीदा शायर मजाज थे, जिन्हे मैंने नहीं पढ़ा था। मैंने उनके कुछ शेर अपनी कापी में लिख लिए। मुजीब की मृत्यु के बाद मैंने मजाज को खो दिया। हाल ही मुझे मजाज का एक दूसरा चाहने वाला हरियाणा के राज्यपाल एआर किदवई के रूप में मिला। वह गाते तो नहीं है, लेकिन बहुत किताबें पढ़ते हैं। उन्होंने उर्दू में हाल ही में प्रकाशित एक किताब मुझे भेजी, जिसका संकलन मजाज की भतीजी सेहबा अली ने किया है। अभी तक मैं मजाज के बारे में केवल इतना जानता था कि वह जबरदस्त पियक्कड़ थे। उनका कुछ समय तक रांची के अस्पताल में शराब की लत छोड़ने के लिए इलाज हुआ था। इससे कोई फायदा नहीं हुआ। उनके जीवन का असमय अंत हो गया। उनकी मृत्यु 1955 में हुई। वह केवल 44 साल के थे। असरार-उल-हक मजाज ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कालेज के जमाने में शायरी लिखनी शुरू कर दी थी। उन्हे फौरन आंखों पर बिठा लिया गया। उनकी नज्म नजर-ए-अलीगढ़ स्टूडेट यूनियन का तराना बन गई। विश्वविद्यालय से निकलने के बाद वह आकाशवाणी में आ गए और साहित्यिक पत्रिका आवाज का संपादन किया। वह वामपंथी प्रगतिवादी लेखक आंदोलन में भी अली सरदार जाफरी के साथ काम करते रहे और नया अदब का प्रकाशन किया। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में 'आवारा है' नामक रचना शामिल है। इसकी कुछ पंक्तियां हैं-शहर की रात और मैं नाकारा फिरूं, जगमगाती, जागती सड़क पे आवारा फिरूं, घर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूं? ऐ गमे दिल क्या करूं? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं?
इस नज्म का अंत पुराने रीति-रिवाजों, सड़ी-गली परंपराओं का विरोध कर किया गया है। मजाज ने महिलाओं की बेबसी को बर्दाश्त नहीं किया। उन्हे बुर्का उतार फेंकने के लिए उकसाया और पुरुषों के साथ एक नया आधुनिक संसार बसाने के लिए कहा। यह आश्चर्य है कि उनके खिलाफ उलेमाओं ने फतवा जारी नहीं किया। यह एक और कारण है कि मजाज को पढ़ना चाहिए। सेहबा अली का संग्रह मजाज के व्यक्तिगत जीवन और उनकी उपलब्धियों के बारे में भरपूर जानकारी देता है। इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया जाना चाहिए।
[खुशवंत सिंह: लेखक जाने-माने स्तंभकार हैं]