सभी धर्मग्रंथों ने नाम-संकीर्तन की विलक्षण महिमा का गायन किया है। सभी कालों में नाम-संकीर्तन की विद्यमानता भिन्न-भिन्न रूपों में रही है। भगवान के पावन नाम का संकीर्तन मानव-मन के कलुष धोने, कामनाओं को पूर्ण करने वाला एवं भक्तिप्रदाता माना जाता है। वस्तुत: भगवन्नाम-संकीर्तन के मूल में जगत की कल्याण-भावना ही निहित है। इहलौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के साथ ही मानव-जीवन के परम लक्ष्य सत्-चित्-आनंद को प्राप्त करने वाली नाम-संकीर्तन-सुधा-धार प्रवाहित होने वाली सुरसरि की भांति निर्मल करने वाला है। सतयुग में ध्यान, त्रेतायुग में यज्ञ और द्वापर में देवार्चन के माध्यम से भगवान की भक्ति प्राप्त करके सांसारिक सुख-सुविधा पाने का एकमात्र उपाय भगवन्नाम बताया गया है, जिसके माध्यम से मनुष्य बिना किसी संशय के संसार-सागर से पार हो जाता है। कलियुग में तामस-धन की सबसे अधिक वृद्धि होती है, जिसके निवारणार्थ भगवन्नाम का आश्रय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मानव-समाज ऋषियों, मुनियों, संतों के उपदेशों को वेदवाक्य मानकर अपने कल्याण के उपाय करता रहा है। मानव मात्र के कल्याण का सर्वाधिक सुगम भगवन्नाम के आश्रय को ही बताया गया। भगवन्नाम के संकीर्तन से अंत:करण निर्मल हो जाता है।
भगवन्नाम-संकीर्तन में हृदय की शुचिता, अग्राह्यंता, मलिनता, कलुषता को समाप्त कर देने की अपूर्व शक्ति होती है। संसार के सभी देहधारी जीवों-नभचरों, जलचरों और थलचरों में मानव-जीवन को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मानव-देहधारी प्राणी ही परमात्मा को नाम-संकीर्तन के माध्यम द्वारा सुगमता से प्राप्त कर सकता है। भगवान् की प्राप्ति के चार साधन माने गए है-नाम, रूप, लीला और धाम। इनमें किसी एक माध्यम का आश्रय प्रभु-प्राप्ति के लिए आवश्यक होता है। भगवान के अनंत रूपों की ही भांति उनके अनंत नाम भी है। इन सभी नामों में 'राम' का नाम ही सर्वश्रेष्ठ, सुगम और सरलतम् है। अनुभवी साधकों, संतों और मुनियों ने राम-नाम को सरल, सुगम और सरस बताया है। श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीनारायण, श्रीहरि आदि भगवान के ही नाम है। नाम की महिमा अपार है। राम शब्द को ही सत्, चित् और आनंद माना गया है।
[डा. राजेन्द्र दीक्षित]