बाढ़ का वार्षिक अभिशाप

 
Sep 07, 12:50 am

उत्तारी बिहार कोसी नदी के अभिशाप से मुक्त होने का नाम नहीं ले रहा है। इस क्षेत्र में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने जहां लाखों लोगों को घर से बेघर कर दिया वहीं हजारों एकड़ भूमि के ऊसर हो जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। जन-धन की व्यापक हानि देखकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोसी के कहर को राष्ट्रीय आपदा की संज्ञा देनी पड़ी। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है कि उत्तारी बिहार में कोसी, गंडक , बागमती ने प्रलय मचाई हो। इसके पहले भी ये नदियां इस इलाके में अपना कहर बरपाती रही है। बाढ़ के आते ही बिहार सरकार केंद्र से मदद की गुहार करती है और उसे बाढ़ पीड़ित लोगों की सहायता के लिए हमेशा एक मोटी रकम उपलब्ध हो जाती है। इस बार बाढ़ की विकरालता देखते हुए प्रधानमंत्री ने एक हजार करोड़ रुपये बिहार को राष्ट्रीय आपदा कोष से दिए है। इसके अतिरिक्त खाद्यान्न और अन्य सामग्री भी मुहैया कराई है। केंद्र के अलावा कई अन्य सरकारी-गैर सरकारी संस्थान भी बिहार के बाढ़ पीड़ितों की अपनी-अपनी तरह से मदद करने के लिए आगे आए है।

उत्तारी बिहार में प्रति वर्ष बाढ़ आना तय सा है, लेकिन बाढ़ से बचने के कोई पुख्ता उपाय नहीं किए जा सके है। इस बार तो बाढ़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन तंत्र, दोनों की पोल खुल गई। राज्य सरकार की भी अक्षमता उजागर हुई और केंद्र सरकार की भी। बिहार सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदार से मुंह नहीं मोड़ सकती कि उसके यहां हर वर्ष बाढ़ आती है और एक गरीब प्रदेश होने के कारण वह उससे बचने और बाढ़ पीड़ितों की मदद करने के वैसे पुख्ता इंतजाम नहीं कर सकती जैसे देश के अन्य राज्यों अथवा विदेशों में कर लिए गए है। इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यान रहे कि अब तक बिहार को बाढ़ से बचने के नाम पर खरबों रुपये की मदद दी जा चुकी है। अगर इस धन का कुछ हिस्सा ही बाढ़ नियंत्रण एवं आपदा प्रबंधन को दुरुस्त करने में किया गया होता तो शायद कोसी ने इतना कहर नहीं ढहाया होता। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बिहार को बाढ़ से बचने के लिए जो अरबों-खरबों रुपये मिले उनमें से ज्यादातर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। ऐसा नौकरशाही के पारदर्शी और जवाबदेह न होने के कारण हुआ। रही-सही कसर राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति के अभाव ने पूरी कर दी। अनेक ऐसे किस्से चर्चा में है कि किस तरह कुछ राजनेताओं ने बाढ़ की विभीषिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताया और केंद्र से मिली सहायता राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई ।

बिहार और साथ ही केंद्रीय सत्ता सदैव इसकी आड़ लेती रही है कि उत्तारी बिहार में बाढ़ के लिए नेपाल जिम्मेदार है, क्योंकि इस इलाके से गुजरने वाली नदियां वहीं से आती है। 50 के दशक में जब इस इलाके में बाढ़ आई थी तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने नेपाल सरकार से बातचीत करके वहां एक बैराज का निर्माण कराया। यह बैराज कोसी की बाढ़ को एक हद तक नियंत्रित करता रहा, लेकिन बाढ़ से बचने के स्थायी उपाय न करने के कारण उत्तारी बिहार रह-रहकर जलमग्न होता रहा। इस बार कोसी के बहाव की तीव्रता के कारण नेपाल स्थित कुसहा बैराज टूट गया और इस नदी की धारा करीब सौ किमी बदल गई। यह आश्चर्यजनक है कि बैराज के कमजोर होने की सूचना बिहार सरकार को मिल गई थी, लेकिन नौकरशाही की लापरवाही और अदूरदर्शिता के कारण समस्या का समाधान नहीं किया जा सका। ऐसा तब हुआ जब बैराज के रख-रखाव की जिम्मेदारी भारत की थी। उत्तारी बिहार में बाढ़ के लिए नेपाल को दोष देने वाली बिहार अथवा केंद्र सरकार ने ऐसा कोई सार्थक प्रयास नहीं किया कि वहां से आने वाली नदियां भारत में कहर न बरपा सकें। यह ठीक है कि दोनों देशों के रिश्तों में पहले जैसी प्रगाढ़ता न रहने के कारण नेपाल ने भारत की बातों को तरजीह नहीं दी, लेकिन क्या इसका यह मतलब था कि भारत हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाता? प्रश्न यह भी है कि क्या उत्तारी बिहार की जनता को बाढ़ की विभीषिका से बचाने के लिए भारत सरकार के पास कोई उपाय नहीं रह गया है? क्या भारत स्वयं को नेपाल से कमजोर समझता है और उस पर दबाव डालने की स्थिति में नहीं? इन प्रश्नों का उत्तार केंद्र सरकार को देना होगा। चूंकि उत्तारी बिहार सदियों से नेपाल से आने वाली नदियों से त्रस्त है इसलिए वहां की अर्थव्यवस्था नष्ट होने के साथ संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। इस इलाके का एक हिस्सा मिथिलांचल के नाम से जाना जाता है, जो समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से एक मिसाल है। आर्थिक रूप से कमजोर होते चले जाने के कारण इस इलाके से बौद्धिक संपदा का भी पलायन हुआ है। आज यहां सिर्फ गरीबी का ही वास नजर आता है।

अगर देश के निर्धन इलाकों का आकलन किया जाए तो शायद उत्तारी बिहार शीर्ष पर दिखाई देगा। यदि उत्तारी बिहार जैसा संकट देश के किसी अन्य हिस्से और विशेष रूप से शहरी क्षेत्र में आता तो राहत एवं बचाव की प्रकृति दूसरी होती। कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तारी बिहार की समस्या को राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र भी हल्के में लेता है? क्या कारण है कि कोसी नदी में प्रलयंकारी बाढ़ आने के कई दिन बाद उत्तारी बिहार की सुधि ली गई-और वह भी मीडिया की सक्रियता के बाद? यह चिंताजनक है कि एक पखवाड़ा बीत जाने के बावजूद बाढ़ ग्रस्त इलाकों में राहत एवं बचाव का कार्य सही तरीके से नहीं हो पा रहा। बाढ़ का पानी उतरने के साथ इस इलाके में महामारी फैलने का खतरा मंडराने लगा है। उत्तारी बिहार की जैसी स्थिति है उसमें महामारी फैलने की आशंका मात्र रोंगटे खड़े कर देती है। कोसी नदी से आई रेत के उर्वर जमीन में फैलने के कारण इस इलाके में अन्न की पैदावार में कमी आना तय है। स्पष्ट है कि यह एक नई समस्या होगी।

उत्तारी बिहार की बाढ़ की जैसी उपेक्षा हुई है उससे तो यह लगता है कि इस इलाके का यह वार्षिक संकट राज्य के नेताओं के लिए फायदे का धंधा बन गया है। हर बार यह सामने आता है कि बाढ़ पीड़ितों को राहत देने के नाम पर केंद्र से हासिल की गई राशि उन तक नहीं पहुंच पाती। बिहार में चाहे बाढ़ कहर ढाए अथवा अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी बढ़ती जाए-यहां के औसत राजनेता अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने से इनकार करते है। बिहार की गिनती देश के बड़े राज्यों में होती है। पहले यहा से लगभग 50 सासद चुने जाते थे, अब 40 सासद उसका प्रतिनिधित्व करते है। केंद्र में सरकार गठन में बिहार ने हमेशा अहम् भूमिका निभाई है। गरीब राज्य का प्रतिनिधि होते हुए भी यहां के सासदों ने संसद में एक अलग स्थान बनाकर रखा है, पर यह आश्चर्य की बात है कि वे उत्तारी बिहार की बाढ़ की समस्या का निराकरण केंद्र से नहीं करा पाए। यदि उन्होंने थोड़ी सी भी तत्परता दिखाई होती तो वे केंद्र पर ऐसा दबाव बनाने में सक्षम हो सकते थे जिससे उत्तारी बिहार बार-बार की बाढ़ के अभिशाप से मुक्त हो जाता। दुर्भाग्य से वे बाढ़ की आड़ में राजनीति करने की तत्परता दिखाते रहे। वे अभी भी ऐसा कर रहे है और यह देखने से इनकार कर रहे है कि कोसी की बाढ़ ने उत्तारी बिहार के साथ-साथ राज्य के शेष हिस्सों को भी निर्धन बनाने का काम किया है। उत्तारी बिहार में बाढ़ के लिए नेपाल को दोषी ठहराने वाले बिहार के साथ-साथ केंद्र के नेताओं को सबसे पहले अपने गिरेबां में झांकना होगा और उत्तार बिहार की जनता को जवाब देना होगा कि आखिर उनकी लगातार अनदेखी क्यों की गई?

[उत्तारी बिहार की बाढ़ के लिए राज्य और केंद्र के नेताओं को जवाबदेह ठहरा रहे हैं संजय गुप्त]




लेख को दर्जा दें

दर्जा दें

0 out of 5 blips

(0) वोट का औसत

average:0
Saving...
    शीर्षकों को अपने "मेरा याहू " पृष्ट पर शामिल करें
  • ज़रा हटके
    Add to My Yahoo! xml
  • संपादकीय
    Add to My Yahoo! xml
  • दृष्टिकोंण
    Add to My Yahoo! xml
  • जागरण यात्रा
    Add to My Yahoo! xml
इस पृष्ठ की सामग्री जागरण द्वारा प्रदान की गई है
कॉपीराइट © 2008 याहू वेब सर्विसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड सर्वाधिकार सुरक्षित