
परमाणु व्यापार के लिए नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) से मिली छूट न केवल भारत की ऐतिहासिक जीत है, बल्कि यह विश्व में अप्रसार व्यवस्था की भी विजय है। एनएसजी की इस छूट का अर्थ है कि 34 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भारत दुनिया के अन्य देशों के साथ नाभिकीय तकनीक और सामग्री का आदान-प्रदान कर सकेगा। नाभिकीय अप्रसार संधि के प्रायोजकों-अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन तथा नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह ने यह तय किया है कि भारत को अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद नाभिकीय व्यापार की अनुमति प्रदान की जाए। दरअसल एनएसजी का गठन ही भारत को 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद निशाना बनाने के लिए किया गया था। एनएसजी को पूर्व में लंदन सप्लायर ग्रुप के रूप में जाना जाता था। अब इस पर मुहर लग गई है कि दुनिया के सभी प्रमुख देश-अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान इस पर एकमत हैं कि भारत को नाभिकीय लेन-देन करने की अनुमति दी जाए। ध्यान रहे, एनएसजी के दिशा-निर्देश स्पष्ट कहते हैं कि ऐसे किसी देश को नाभिकीय व्यापार की इजाजत नहीं दी जा सकती जिसने एनपीटी पर हस्ताक्षर न किए हों और जो अपने सभी रिएक्टरों पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी को स्वीकार न करता हो। भारत इस व्यवस्था के अपवाद के रूप में सामने आया है। लिहाजा हमें यह समझने की जरूरत है कि दुनिया की सभी प्रमुख शक्तियों ने आखिर भारत को यह छूट प्रदान करने की पहल क्यों की? आज तीन देशों को छोड़कर दुनिया के सभी देश एनपीटी के हस्ताक्षरकर्ता हैं। जिन तीन देशों ने नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं वे हैं इजरायल, भारत और पाकिस्तान। इन तीनों देशों ने नाभिकीय हथियार भी प्राप्त कर लिए हैं। इजरायल ने अभी तक कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया है, लेकिन भारत और पाकिस्तान ऐसा कर चुके हैं। अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया की सभी बड़ी शक्तियां नाभिकीय अप्रसार व्यवस्था को मजबूत बनाना चाहती हैं ताकि नाभिकीय तकनीक और सामग्री के अवैध हस्तांतरण पर रोक लगाई जा सके। इसके तहत देशों द्वारा नाभिकीय तकनीक के हस्तांतरण, नाभिकीय उपकरण तथा सामग्री के निर्यात में निश्चित दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है।
विश्व की कुल आबादी का छठवां हिस्सा भारत में निवास करता है। इसके साथ ही भारत को उच्च नाभिकीय तकनीक वाला देश माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय तापीय-नाभिकीय ऊर्जा शोध समूह के एक सदस्य द्वारा ऐसी स्वीकारोक्ति की जा चुकी है। भारत ने अपने रिएक्टर खुद डिजाइन किए हैं और वह एक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर रहा है। इसके साथ ही भारत में थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित करने की तकनीक पर भी शोध जारी है, जिसकी मदद से होमी भाभा के त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम का तीसरा चरण आरंभ किया जा सकेगा। इजरायल नाभिकीय व्यापार का इच्छुक नहीं है। पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति बुश 2006 की अपनी उपमहाद्वीप की यात्रा में यह दृष्टिकोण जाहिर कर चुके हैं कि उसका एक अलग इतिहास है, वह एक अलग देश है और उसकी जरूरतें भी अलग हैं। आखिर यह भुलाया नहीं जा सकता कि चीन और पाकिस्तान नाभिकीय प्रसार के मामले में विश्व के दो कुख्यात देश हैं। चीन एनपीटी पर हस्ताक्षर कर चुका है और उसका एक व्यापक नाभिकीय कार्यक्रम भी है। लिहाजा एनएसजी ने उसे अपने संगठन में शामिल कर लिया ताकि उसे अप्रसार व्यवस्था का एक जिम्मेदार देश बनाया जा सके।
अप्रसार के मामले में भारत का रिकार्ड एकदम स्वच्छ है। नई दिल्ली को दुनिया में शक्ति के छह संतुलनकर्ताओं में से एक माना जा रहा है। इन परिस्थितियों में भारत को अप्रसार व्यवस्था से बाहर रखना तर्कसंगत नहीं हो सकता। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने भारत को एनएसजी की छूट दिलाने के लिए विशेष रुचि ली। जुलाई में जापान में जी-9 की बैठक में ही अमेरिका ने सभी बड़े देशों को इसके लिए मना लिया था। चूंकि भारत के लिए इतने बड़े पैमाने पर समर्थन जुटा लिया गया था इसलिए एनएसजी में विरोध केवल चार देशों-आस्ट्रिया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड और स्विट्जरलैंड तक सीमित रह गया। ये देश नाभिकीय व्यापार में शामिल नहीं हैं, लेकिन अपनी मजबूत अप्रसार विचारधारा का संकेत देने के लिए उन्होंने एनएसजी में शामिल होने का फैसला लिया था।
एनएसजी की महत्वपूर्ण बैठक से पहले भारत ने परमाणु परीक्षण पर स्वत: रोक का जो संकल्प व्यक्त किया उससे नई दिल्ली के पक्ष में वातावरण बनाने में मदद मिली। वस्तुत: यह घोषणा सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र आमसभा में की थी। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपनी तरफ से भारत की इस घोषणा को दोहराया भर था। परमाणु हथियारों के संदर्भ में राजग सरकार ने ही भारत की यह नीति घोषित की थी कि नई दिल्ली परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने, हथियारों की किसी होड़ में न शामिल होने तथा पूरी गंभीरता से अप्रसार के मानकों का अनुपालन करने के प्रति प्रतिबद्ध है। इसी नीति का अनुकरण संप्रग सरकार ने भी किया। कुछ आलोचक हैं जो यह आरोप लगा रहे हैं कि भारत ने परमाणु परीक्षण करने का अपना अधिकार खो दिया है, लेकिन यह पूरी तरह गलत विचार है। परमाणु परीक्षण का अधिकार एक संप्रभु अधिकार है। इसी तरह ऐसे किसी परीक्षण पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना दूसरे देशों का अधिकार है। जब तक कि बहुपक्षीय संधि न हो तब तक कोई किसी से यह अधिकार नहीं छीन सकता। भारत इस तरह की किसी वचनबद्धता में शामिल नहीं हो रहा है। जो लोग एनएसजी में पेश किए गए मसौदे को परमाणु परीक्षण के अधिकार का समर्पण बता रहे हैं वे संप्रभुता का अर्थ ही नहीं जानते।
[भारत को नाभिकीय व्यापार के लिए मिली एनएसजी की अनुमति का अर्थ बता रहे हैं के.सुब्रहमण्यम]