राजरंग: बीरबल

 
Sep 07, 12:50 am

कुछ ही नेता ऐसे भले होते हैं, जो न सिर्फ अपनी गलती मान लेते हैं, बल्कि भविष्य के मद्देनजर तौबा भी कर लेते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने भी शैम्पेन प्रकरण को रफा-दफा करने में तनिक भी देर नहीं लगाई और शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से लेकर वैंकेया नायडू और सुषमा स्वराज तक यानी सभी बड़े नेताओं की चौखट पर जाकर 'बाबा माफ करो' की गुहार लगाई। चूंकि वक्त चुनाव का है, सो वेंकैया नायडू ने लगे हाथ उन्हें नसीहत भी दे कि डाली सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं का खास ध्यान रखें। इससे जावडेकर तो अनुशासन कार्रवाई से बच ही गए, पार्टी के बाकी शो मेन बनने का सपना पालने वाले 'क्लब' नेताओं को भी संभलने के सीधे संकेत मिल गए हैं। खासकर उनको, जिन्हें शीघ्र ही लोकसभा चुनाव भी लड़ना है।

[महाराजातंत्र]

कांग्रेस में इन दिनों आंतरिक लोकतंत्र के मुद्दे पर जमकर बहस हो रही है। इस बहस को शुरू करने का पूरा सेहरा पार्टी के 'युवराज' यानी राहुल गांधी के सिर बांधा जा रहा है। पार्टी के युवा संगठनों में चुनाव कराने की उनकी योजना तैयार हो चुकी है। हो सकता है कि आंतरिक लोकतंत्र का यह अभियान मुख्य संगठन तक भी जाए। परिवारवादी पार्टी में उस परिवार का व्यक्ति कोई ऐसी बात कहे तो यह पार्टीजनों के लिए खुश होने की बात है। मगर कांग्रेसी 'युवराज-महाराज' की परंपरा छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। इस सप्ताह राजधानी में पं. कमलापति त्रिपाठी की जयंती समारोह में तो यह साफ हो गया। राहुल गांधी मंच पर नहीं बल्कि नीचे पहली पंक्ति में बैठे थे। आजू-बाजू तो दूर उनके आगे-पीछे की दोनों पंक्तियों में भी कोई नहीं बैठा। दिग्गज पार्टी नेता भी युवराज से दूरी बनाए हुए थे। मतलब यह कि राहुल भले ही युवराज के संबोधन को न पसंद करें, कांग्रेसी उन्हें एक कदम और आगे जाकर 'महाराज' बनाने की तैयारी में हैं?

[हम नहीं सुधरेंगे]

बिहार बाढ़ से बेहाल है, लेकिन राजनीति अपने चरम पर है। केंद्र में सत्ता सुख भोग रहे बिहार के मंत्रियों ने अपने स्तर पर राहत कार्यक्रम चला रखा है। एक ही स्थान पर दो-दो पार्टियों के राहत शिविर चल रहे हैं। एक तरफ लोक जनशक्ति पार्टी ने कैंप लगा रखे हैं तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल ने। दरअसल बाढ़ पीड़ितों को पीड़ित कम बल्कि वोटर ज्यादा समझा जा रहा है। नेताओं को फोटो खिंचाने से राहत मिलती है और कार्यकर्ताओं को नारेबाजी से। एक मंत्री महोदय ने तो एक कैंप में तभी साड़ियां बांटनी शुरू की जब स्थानीय मीडिया की टीम वहां पहुंच गई। सुनते हैं कि एक अन्य मंत्री ने राहत के नाम पर करोड़ों रुपये जुटा तो लिए, लेकिन अब उसे अपनी पार्टी के नाम से बाढ़ पीड़ितों में बांटना चाहते हैं।

[कामरेडों की निराशा]

लंबी मशक्कत के बाद आखिरकार एनएसजी में भारत को छूट मिल ही गई। जाहिर है परमाणु करार के पीछे पड़े वामदलों को गहरी निराशा हुई। गोपालन भवन में चल रही माकपा पोलित ब्यूरो की बैठक में भी इसका असर दिखा। परमाणु करार रोकने को लेकर पार्टी के मुखिया प्रकाश करात को एनएसजी से बड़ी उम्मीदें जो थीं। गोपालन भवन से निकलते हुए एक वरिष्ठ कामरेड ने यह बोलकर काफी कुछ कह दिया 'करार के रास्ते से एक बड़ी रुकावट निकल गई और वामदलों के हाथ से संधि अटकाने का एक अच्छा मौका।' करात के समर्थक अब यही सोच कर मन बहला रहे हैं कि एनएसजी में भारत को भले ही कामयाबी मिल गई हो, लेकिन वहां भी वामपंथियों ने अपनी भूमिका खूब निभाई। कम्युनिस्ट देश चीन से लेकर आस्ट्रिया में सत्तारुढ़ गठबंधन के घटक वामपंथियों ने एनएसजी में अमेरिका और भारत के पसीने छुड़ा दिए। बाकायदा पोलित ब्यूरो में इस पर संतोष जताया गया।

[भला क्या-बुरा क्या]

केंद्र की यूपीए सरकार को मुश्किल में डालने वाले वामपंथी दल रघुवंश बाबू को फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं, पर बात अगर बिहार की हो तो उन्हें वामपंथी नेताओं से हाथ मिलाने में कोई परहेज नहीं है। परमाणु करार पर वामदलों ने जिस मौके पर सरकार से नाता तोड़ा और परमाणु मुद्दे पर सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी घेरा उससे रघुवंश सख्त नाराज हैं। उन्हें काफी भला बुरा कहने से नहीं चूकते हैं, लेकिन बिहार में चुनाव की बात छेड़ते ही उनके सुर बदल जाते हैं। उनका कहना है कि भई बिहार की बात अलग है। हम तो चुनाव माकपा के साथ मिलकर लड़ेंगे। वे हमारे पुराने चुनावी सहयोगी भी हैं। ऐसे में हम भला उन्हें कैसे छोड़ सकते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के साथ वामपंथियों के संबंधों की याद दिलाने पर रघुवंश बोल जाते हैं कि यही तो राजनीति है।




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