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नीतियों में छिद्र का लाभ

Jul 02, 11:05 pm
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हमारा देश कैसे चल रहा है, कौन इसे चला रहा है, नीतिया कैसे बन रहीं हैं उनका हश्र क्या हो रहा है आदि प्रश्नों पर जब हम विचार करते हैं तो हमारे सामने अत्यंत चिंतानक स्थिति उभरती है। ऐसा लगता है मानो हर आर्थिक नीति के पीछे कुछ ऐसी अदृश्य शक्तिया काम कर रही हैं जो परस्पर हित के लिए उनका उपयोग करतीं हैं और उन्हें इसकी कोई सजा भी नहीं मिलती। अभी हमारे सामने पिछली सरकार की स्पेक्ट्रम नीति का हश्र सुर्खियों में है। सरकार ने संचार के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले स्पेक्ट्रम को 'पहले आओ पहले पाओे' के आधार पर कम कीमत में बेचा। कल्पना यह थी कि कम कीमत में खरीदने वाली कंपनिया इसका लाभ आम उपभोक्ता तक पहुंचाएगी एवं संचार ज्यादा सुलभ होगा, लेकिन बजाय उस योजना पर काम करने के उन्होंने इसका ही व्यापार किया। इनमें से किसी ने संचार क्षेत्र में कोई काम नहीं किया। इस योजना से किसी को एक फोन तक नसीब नहीं हुआ और इनकी जेब में अरबों का मुनाफा आ गया।

अगर समय-समय पर निकलने वाली किसी भी क्षेत्र की ऐसी योजनाओ की परतें खोलेंगे तो आपको न जाने ऐसे कितने उदाहरण मिलेंगे जिसमें केवल कागजी अधिकार या योजनाओं के आधार पर इतना लाभ अर्जित करने का उदाहरण सामने आएगा जितना यथार्थ में काम करके इतनी जल्दी नहीं कमाया जा सकता था। राज्य द्वारा बाजार पूंजीवाद के अनुसार आर्थिक ढाचे को परिणत करने के कदमों के फलस्वरूप बिना मेहनत धन कमाने की प्रवृत्ति और सुदृढ़ हुई है। इन सबमें मुख्य भूमिका राज्य की ही है। राज्य व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों को निर्बाध बनाने के लिए नियमें बनाता है, लेकिन उसका लाभ कौन किस प्रकार उठा रहा है इसे रोकने की स्वत: प्रक्रिया इसमें नहीं है। एक कारण यह बताया जाता है कि नियम बनाने वालों को आरंभ में यह कल्पना नहीं होती कि उनके नियमों का बेजा लाभ उठाने वाले दिमाग क्या-क्या यत्न कर मुनाफा कमा सकते हैं। वर्तमान लोकसभा में इस समय 33 सासद करोड़पति हैं। इनकी कुल संपत्ति है 3075 करोड़ रुपया। यानी औसत प्रति सासद करीब साढ़े पाच करोड़ की संपत्ति है। सरकार चलाने वाली काग्रेस के सबसे ज्यादा 138 करोड़पति हैं। उसके बाद भाजपा के 58, सपा के 14, बसपा के 13, द्रमुक के 11, शिवसेना के नौ, जेडीयू के आठ, राकापा के सात तथा बीजू जनता दल एवं तृणमूल काग्रेस के छह-छह सासद करोड़पति हैं। जरा सोचिए, ये सासद मुख्यत: किस वर्ग के हितों के लिए काम कर रहे होंगे?

हाल में संपन्न आम चुनाव में उम्मीदवारों द्वारा दाखिल शपथ पत्र को देखेंगे तो इनमें से बड़ी संख्या ने अपनी आय का स्त्रोत रीयल इस्टेट और खेती को बताया है। इनके धन में कुछ सालों के अंदर ही कई गुने की बढ़ोत्तरी हुई है। कैसे? पिछले पाच साल तक आवास क्षेत्र में कितनी तेजी थी? मकान एवं जमीन के व्यापार का पूरा परिदृश्य बदला और उनके दाम 30 से 40 गुना तक बढ़ गए। कैसे हुआ यह सब? सरकार ने ही आवास के लिए जमीन आवंटन से लेकर उनके विकास के आसान नियम, उनके लिए धन उपलब्ध कराने के रास्ते और लोग उन घरों को खरीदें इसके लिए बैंकों से सस्ते दर पर कर्ज दिलवाए। दो-तीन सालों तक ऐसा माहौल बनाया गया मानो भारत के प्रमुख शहरों में आवास क्राति हो रही है। इसने बिचौलियों की भरमार कर दी। इसमें कल के खाकपति अरबपति बन गए, लेकिन आम आदमी के लिए घर खरीदना दूभर हो गया। सारी नीतिया बनती रहीं आम आदमी को घर उपलब्ध कराने के लिए, बैंकों ने कर्ज के लिए अपने खजाने खोले, सरकार ने रिजर्व बैंक के माध्यम से उन्हें रियायतें दीं, शहरों ने आसानी से जमीन आवंटित किए, लेकिन न दाम पर नियंत्रण रखने की कोई नीति थी और न बिचौलियों पर अंकुश लगाने की। अगर कोई यह शंका व्यक्त करता है कि जानबूझकर ऐसा किया गया तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है? जब राजनीतिक प्रतिष्ठान के शीर्ष लोगों का सीधा या परोक्ष इस व्यवसाय से रिश्ता हो तो यह मानने में कोई हर्ज ही नहीं है कि व्यावसायिक मुनाफे के लिए इन्होंने नीतियों को प्रभावित किया है।

आज भी आवास उद्योग को मंदी की मार से बचाने के नाम पर इतनी सारी रियायतें एवं सुविधाएं दी जा रहीं हैं, लेकिन आवास के मूल्यों के बारे में कोई नीति नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार नई सुविधाएं और रियायतों के पूर्व इस बात की जाच करवाती कि कैसे घर इतने महंगे हुए, किन लोगों ने इससे अकूत मुनाफा कमाया? फिर आवास क्षेत्र का उचित नियमन किया जाता, गलत करने वाली कंपनियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगता, मूल्यों की श्रेणिया बनतीं और सारी रियायतें उन्हें ही दी जातीं जो सरकारी नीतियों का पालन करते। इसके लिए एक निगरानी तंत्र बनता, लेकिन ऐसा कुछ होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।

[अवधेश कुमार: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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