अपने देश में करीब 13 हजार लोगों की सुरक्षा के लिए 45 हजार पुलिस वालों को ड्यूटी पर लगाया जाता है। दिल्ली में ही सुरक्षा के काम में दिल्ली पुलिस की एक चौथाई ताकत लगी रहती है और वीआईपी सुरक्षा उपलब्ध कराने में सरकारी खजाने से करीब 6 अरब रुपया सालाना खर्च होता है। इसके अलावा एसपीजी का एक अलग संगठन है जो वर्तमान और पूर्व प्रधानमंत्रियों के परिवारों की सुरक्षा में लगा हुआ है। इन सबके ऊपर राज्यों के मुख्यमंत्री और आला अधिकारियों की सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिस वाले लगे रहते हैं जबकि कागजों पर उनकी ड्यूटी जनता की सुरक्षा के लिए लगाई जाती है। इस तरह की सुरक्षा की व्यवस्था ज्यादातर नेताओं के लिए ही की जाती है। तर्क यह होता है कि सरकारी काम करने के चक्कर में नेता लोग ताकतवर अपराधियों को नाराज कर देते हैं जो बदला लेने के उद्देश्य से उनको नुकसान पहुंचा सकते हैं। बहुत सारे पूर्व मंत्रियों और नेताओं को भी सुरक्षा मिली हुई है। उनको खतरा है कि सरकारी कामकाज करने के दौरान उन्होंने ऐसे काम किए होंगे जिसकी वजह से उन्हें खतरा है लिहाजा उनकी जान बचाए रखने के लिए जनता के पैसे से उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था की उपयोगिता और उसकी जरूरत पर राष्ट्रीय बहस की शुरुआत करने की घोषणा की है। उनका तर्क है कि ऐसे लोग जिन्हें सुरक्षा की जरूरत नहीं है, उनकी सजावट के लिए जनता का पैसा फूंकना कोई अक्लमंदी नहीं है। चिदंबरम ने इस बहस को गंभीरता देने के लिए अपनी सुरक्षा को कम से कम स्तर पर रखने का फैसला किया है। सुरक्षा के फालतू तामझाम से बचने वाले शीर्ष नेताओं में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम सबसे ऊपर है। इस तरह से और भी बहुत से नेता हैं जिन्हें सुरक्षा के तामझाम की जरूरत नहीं है। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में सरकारी खर्च पर सुरक्षा केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ही दी जाती है। चिदंबरम का तर्क है कि अपने यहां भी सरकारी काम करने वाले लोगों को ही सुरक्षा दी जानी चाहिए और अगर किसी को ऐसा खतरा है तो उसे अपने खर्च पर सुरक्षा का इंतजाम करना चाहिए।
इस बहस की शुरुआत के पीछे गृहमंत्री की उस झल्लाहट का भी योगदान है जो वह आजकल झेल रहे हैं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और पीलीभीत के नवनिर्वाचित सांसद वरुण गांधी ने जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है और यह महानुभाव गृहमंत्रालय के चक्कर काट रहे हैं। इसी तरह से कुछ और भी लोग हैं जो दिन-रात सुरक्षा व्यवस्था की फरियाद करते रहते हैं। सवाल यह है कि जब एपीजे अब्दुल कलाम या पी. चिदंबरम सुरक्षा के तामझाम के बिना सुरक्षित महसूस करते हैं तो बाकी छुटभैये नेताओं को सुरक्षा की इतनी सख्त आवश्यकता क्यों पड़ती है? जहां तक मंत्री पद पर रह चुके लोगों की बात है वह तो समझ में आती है, लेकिन जो कभी किसी सरकारी पद पर रहा ही नहीं हो उसने जनहित में ऐसा क्या काम कर दिया कि उनके पीछे देश के दुश्मन और निहित स्वार्थ के लोग पड़ गए और उनकी जान को खतरा पैदा हो गया। वह भी उस देश में जहां सत्ता की राजनीति के शीर्ष पुरुष जवाहर लाल नेहरू रहे हों। जवाहरलाल नेहरू के साथ सुरक्षा का कोई तामझाम नहीं रहता था। वे दिल्ली के रीगल सिनेमा में इंदिरा जी के और अन्य लोगों के साथ सिनेमा भी देखते थे। जहां आज अशोक होटल है, वहां रोज ही टहलते थे और त्यौहारों के मौके पर उनके घर पर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं होता था। उनकी सवारी निकलने पर कभी भी कोई सड़क बंद नहीं की जाती थी। यह इंतजाम तो 1979 तक रहा। प्रधानमंत्री की सवारी निकलने पर सड़कें बंद नहीं होती थीं।
1980 में सब कुछ बदल गया। इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने बड़ी संख्या में अपराधियों को टिकट दिया। इंदिरा लहर में सब जीत गए और माननीय बन गए। जिन लोगों के घरों पर पुलिस दबिश देती रहती थी, उनके यहां पुलिस वाले सुरक्षा ड्यूटी में लगाए जाने लगे। जिन लोगों को हवालात में होना चाहिए था वे थानों का मुआयना करने लगे। उनके पिछले कारनामे ऐसे थे कि उन्हें कोई भी राह चलते मार सकता था। अब चूंकि ऐसे लोग संसद या विधानसभा के सदस्य थे, इसलिए उनकी हिफाजत का जिम्मा पुलिस को लेना पड़ा। हर ऐरे गैरे नेता को सुरक्षा देने की परंपरा यहीं से शुरू होती है। इसके बाद तो हर पार्टी में अपराधियों का बोलबाला हो गया। जिन पुलिस वालों को अपराध पर काबू करने की नौकरी दी गई थी, वे नेताओं की सुरक्षा में लग गए। अगला दौर सरकारी सुरक्षा के दुरुपयोग का था। सांसदों- विधायकों के अलावा नेताओं के खास लोगों को भी सुरक्षा मिलने लगी। जिनके ऊपर भी मुख्यमंत्री मेहरबान हो गए, उन्हें गनर उपलब्ध करा दिया। ऐसे सैकड़ों मामले प्रकाश में आए हैं जहां अपना दबदबा बनाने के लिए नेताओं ने सरकारी सुरक्षाकर्मियों का इस्तेमाल किया। कई मामलों में तो किसी देनदार का पैसा हड़पने या जमीन पर नाजायज कब्जा करने के लिए भी सुरक्षा में तैनात पुलिस वालों का इस्तेमाल किया गया।
अपना मुकामी रंग चमकाने में सुरक्षा कर्मियों के इस्तेमाल की भी बहुत सारी खबरें मिलती रहती हैं। जाहिर है इस सब का राष्ट्रहित और जनहित के किसी काम से कोई मतलब नहीं है। सरकारी सुरक्षा की मशीनरी ज्यादातर राजनेताओं की ही खिदमत में लगी हुई है इसलिए इसे खत्म कर पाना बहुत मुश्किल होगा। पिछले तीस साल में जिस नेतापोषक व्यवस्था ने अपनी जडे़ं दूर-दूर तक फैलाई हैं, उसको कमजोर कर पाना कठिन होगा, लेकिन असंभव नहीं। गृहमंत्री ने भी इसे तुरंत खत्म करने की बात नहीं की। फिलहाल एक बहस की शुरुआत की है। जरूरत इस बात की है कि इस बहस का दायरा बढ़ाया जाए और अपराधी प्रवृत्तिके नेताओं को उनकी असलियत का बोध कराया जाए। वैसे लोकसभा चुनाव 2009 में जनता ने इसकी शुरुआत कर दी है।
[शेष नारायण सिंह: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]