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प्रेमाभक्ति का स्वरूप

Jul 03, 10:33 pm
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भगवान के प्रति तीव्र अनुराग अथवा अनुरक्ति तथा निष्कपट एकनिष्ठ निष्काम प्रेम सहित चित्तवृत्ति का निरंतर प्रभु में लीन रहना 'भक्ति' है। देवर्षि नारदजी ने भगवान् के क्षणिक विस्मरण से चित्त में परम व्याकुलता की अनुभूति को प्रेमा-भक्ति का प्रमुख लक्षण बताया है। प्रियतम के प्रति सर्वात्म समर्पणयुक्त माधुर्य-भाव प्रेम की प्रगाढ़ता का सघनतम रूप है। लौकिक मान्यता के विपरीत श्रृंगाररस प्रधान कांताभाव में 'स्वकीया' से 'परकीया' भाव श्रेष्ठतर है। प्रेमास्पद का अनवरत चिंतन, मिलन की तीव्र उत्कंठा, दोषदृष्टि का सर्वथा अभाव तथा प्रियतम से स्वार्थपूर्ति की अनिच्छा-परकीयाभाव की विशेषताएं है। निडर ब्रजगोपांगनाओं द्वारा लोक-वेद की मर्यादा का उल्लंघन 'समर्थारति' का परिचायक है। उनका मन श्यामसुंदर में समाहित था और प्राण कन्हैया के प्राणों से अनुप्राणित थे- 'ता मन्मन्का मत्प्राणा मदर्थे त्क्ततदैहिका:' । प्रेम का परम सार 'भाव' है और भाव की पराकाष्ठा है- 'महाभाव'। श्रीराधाभाव महाभाव की सर्वोच्च अवस्था है, जिस पर साधारण भक्तों का अधिकार नहीं।

'श्रीरामचरितमानस' में मुनि वशिष्ठजी ने प्रेमा-भक्ति को अंत:करण की शुद्धता का अनिवार्य साधन बतलाया है-'प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुं न जाई॥' श्रद्धा, सत्संग, भजन-क्रिया, अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि एवं आसक्ति क्रमश: विकसित व परिपूर्ण होकर 'प्रेम' तथा प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव एवं महाभाव उत्तरोत्तर विकसित व परिपूर्ण होकर 'प्रेमा-भक्ति' में परिणित होते है। भक्तगण मुक्ति का भी तिरस्कार कर भगवान से प्रेमा-भक्ति की ही याचना करते है। बालि ने अंत समय में 'जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तंह राम पद अनुरागऊं' का और खगपति जटायु ने भी मरणासन्न अवस्था में प्रभु श्रीराम से उनकी अविरल भक्ति का ही वर मांगा। भक्त-शिरोमणि हनुमान ने 'नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥' कहते हुए और स्वयं ब्रह्माजी ने 'नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनाबुंज प्रेम सदा सुभदं॥' के अंतर्गत प्रभु श्रीराम से प्रेमा-भक्ति का ही वर मांगा।

[डा. मुमुक्षु दीक्षित]

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