दिखावे वाला विकास

 
Jul 03, 10:34 pm

आमतौर पर यह समझा जाता है कि उपभोग और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और भारतीय समाज में जहा दिखावा करने वालों का प्रतिशत अस्सी हो वहा विकास और उपभोग को गहराई से समझने की जरूरत है। गावों में और शहरों की जीवन शैली को समझे बगैर कोई भी धारणा बनाना गलत हो जाएगा। हम संसाधनों के इस्तेमाल को सीधे विकास से जोड़ देते हैं, जबकि संसाधनों के उपभोग से विकास का वैसा रिश्ता नहीं है, अमूमन जैसा हम समझते हैं। अवध के गावों में कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति बड़े ठाट से रहता है। उनके ठाट का आलम यह है कि खाना खाने के बाद जब पालतू जानवरों को कौरा देते हैं तो हर बार पूड़ी ही होती है, जबकि असलियत यह होती है कि वह व्यक्ति ठीक से खाना भी नहीं खाया होता है। मतलब असलियत और दिखावे में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ठीक यही हालात हमारे तथाकथित विकास की भी है। पिछले बीस सालों में देश में एक बहुत बड़ा बाजार तंत्र खड़ा किया गया। विदेशी वस्तुओं से भारत के बाजारों को पाट दिया गया और यह जोर-शोर से प्रचारित और प्रसारित करना शुरू किया गया कि अब देश में किसी वस्तु की कमी नहीं है। साथ में यह भी कहा जाने लगा कि उपभोग करने की क्षमता और रफ्तार बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। यह एक झूठ और साजिशपूर्ण विज्ञापन था, जिसे ऐसे पेश किया जा रहा था जैसे वाकई में हम विकास की ऊंची छलाग लगा चुके हैं। फिर जब हमें समझ में आया यह एक विकास का विज्ञापन था तो अपनी समझ को ही कोसने लगे।

अर्थशास्त्र को जानने वालों का यह मानना है कि किसी व्यक्ति का उपभोग सिर्फ उसकी आय पर ही निर्भर नहीं होता है,,बल्कि दूसरे के उपभोग भी उसको काफी हद तक प्रभावित करते हैं । ठाट-बाट के संसाधन इन्हीं वस्तुओं में आते हैं, जिनका उपभोग आमतौर पर लोग शान दिखाने और हैसियत साबित करने के लिए करते हैं, जरूरत के लिए कम। यह बात शहरों से अधिक गावों में देखी जा सकती है। समाज में जैसे-जैसे दिखावे की प्रवृति बढ़ रही है वैसे-वैसे असली जीवन की छटा भी गायब होती जा रही है। जीवन शैली में आया यह बदलाव जहा बाजारवाद की शक्तियों को बढ़ावा दे रहा है वहीं भारतीय जीवन शैली को विकृत करता जा रहा है। गावों की जीवन शैली को इस बाजारी व्यवस्था ने इस तरह विकृत कर दिया है कि अब लगता ही नहीं कि ये वही भारतीय गाव हैं जहा इंसानियत का अलग रूप दिखाई पड़ता था। बाजारीकरण के कारण जो गैर-बराबरी बढ़ रही है उसने गावों के असली विकास पर सवाल पैदा कर दिया है। इसलिए जो विकास गावों में दिखता है वह विकास नहीं, बल्कि बाजारीकरण की मजबूत होती पैठ है। यही उपभोक्तावाद है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन ने कुछ साल पहले भारत के गावों का एक सर्वेक्षण किया था। इसके मुताबिक ग्रामीण इलाकों में पिछले एक दशक 1993-94 से 2004-05 के दौरान गावों में उन ऐशो-आराम की वस्तुओं का उपभोग तेजी के साथ बढ़ा है जो अमूमन शहरों के रईसजादों के पास हुआ करती थीं। इससे यह धारणा बननी शुरू हो गई है कि उपभोग के मामले में गाव शहरों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं, लेकिन बात महज इतनी सी नहीं है।

आकड़ों की जादूगरी में मन को उलझा देने से असलियत दब जाएगी। देखना यह चाहिए कि इस प्रकार के सर्वे किस मूल बात को प्रकट करने में चूक जाते हैं। आज भी भारत की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कृषि ही है। गावों में रहने वालों में 95 प्रतिशत लोग खेती से ही जीविका अर्जित करते हैं और इन खेती करने वालों में 85 फीसदी लोग सीमात या छोटे किसान हैं। इनकेपास मोटर वाहन अथवा टीवी कैसे हो सकते हैं? मतलब गावों में जो उपभोग की वस्तुएं खीदते हैं उनकी तादाद महज 15 प्रतिशत से कम ही है। इसलिए पंद्रह प्रतिशत वालों के जरिए उपभोग की जा रही वस्तुओं के आकड़ों से गावों की खुशहाली का अनुमान लगाना उचित नहीं लगता है। यदि इसे विकास से जोड़ा जाए तो यह महज 15 प्रतिशत वालों का ही विकास हुआ। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रपट यह भी बताती है कि गावों में आजादी के साठ सालों के बाद भी दस प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनके पास खर्च करने के लिए बमुश्किल दस रुपए भी नहीं होते हैं और यदि शहरों को देखे तो यह आकड़ा 12 प्रतिशत के आस-पास पहुंचता है। इस लिहाज से देखा जाए तो उपभोग और विकास के अंतरसंबंधों में कोई ताल-मेल नहीं दिखाई पड़ता है। मतलब जब तक गाव के सबसे निर्धन व्यक्ति के पास विकास की किरण नहीं पहुंचती, विकास होना नहीं माना जा सकता है। जब तक सबको रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा की गारंटी नहीं दी जाती है तब तक विकास की बात करना महज ढोल पीटना माना जाएगा।

[अखिलेश आर्येन्दु: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]




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