राम नाम नौका

 
Jul 04, 11:28 pm

नीर-क्षीर विवेकी हंस की भांति विमल बुद्धि रखने वाले आचार्य जब इस संसार की रचना का अवलोकन करते है तब वे इसे सागर की भांति निरूपित करते हुए कहते है कि जिस तरह से सागर के ओर-छोर का पता नहीं है उसी तरह से इस संसार का ओर-छोर अज्ञात है। सागर की गहराई के समान इस संसार की गहराई नापना कठिन है। सागर में भांति-भांति के जलचर घूमते है और जैसे ही उन्हे अवसर मिलता है वे व्यक्ति को अपना ग्रास बनाने में चूकते नहीं है उसी तरह से संसार में काम, क्रोध, लोभ, मद, मान जैसे घातक भाव है जो व्यक्ति के जरा-सा अविवेकी होने पर उसे अपना ग्रास बना लेते है। संसार में ईष्र्या, असंतोष, यश पाने की लालसा जैसी लहरे है, जिनसे साधारण व्यक्ति की तो बिसात ही क्या है, बड़े से बड़े साधक संत भी विचलित हो जाते है तथा अपना अस्तित्व गंवा बैठते है। सागर से जो पार जाना चाहते है वे संसारी जनों के द्वारा निर्मित नौकाओं तथा जहाजों से उसे पार कर लेते है और अपने लक्ष्य को पा जाते है। जब यह जिज्ञासा की जाती है कि जिस प्रकार व्यक्ति सांसारिक नौकाओं के सहारे सागर से पार चला जाता है उसी प्रकार यदि कोई संसार-सागर को पार करना चाहता है तो उसके लिए कौन-सा सहारा है? इस पर अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से समाधान दिया है तथा संसार-सागर से पार जाने का रास्ता बताया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम-नाम के सहारे से राम-नाम रूपी नौका के माध्यम से भव-सागर पार जाने का सरल मार्ग बताया है। राम-नाम नौका के सहारे कैसे भव पार हो, इस पर अपना अभिमत व्यक्त कर संत कहते है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते, संसार के सभी काम करते हुए अपने मुख से राम-नाम का उच्चारण निरंतर करना है। व्यक्ति चाहे जहां जा रहा हो, उसे चाहिए कि वह उस क्रिया में लगे रहते हुए भी अपने मुख से राम-नाम का उच्चारण करता रहे। चलते-चलते जब वह श्रमित हो जाए और श्रम के परिहार के लिए वह विश्राम करने हेतु बैठे तब भी वह शरीर से विश्राम करे, किंतु अपनी जिह्वा से राम-नाम के स्मरण को न भूले। इतना ही नहीं, वह अपना सांसारिक जीवन चलाने के लिए चाहे जो काम करे, कभी-भी किसी भी अवस्था में भी राम का नाम लेना बंद न करे।

[डा. गदाधर त्रिपाठी]




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