
संप्रग सरकार ने बजट के पहले जो आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया वह नि:संदेह बेहतर भविष्य की तस्वीर पेश कर रहा है। इस सर्वेक्षण से इसलिए भी उत्साहित हुआ जा सकता है, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री की हैसियत से आर्थिक सुधारों के जिस कार्यक्रम की शुरुआत की थी वह एक बार फिर आगे बढ़ता नजर आ रहा है। यह कार्यक्रम मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री के रूप में पिछले कार्यकाल के दौरान थम गया था, क्योंकि संप्रग सरकार वाम दलों पर निर्भर थी और आर्थिक सुधारों के प्रति वाम दलों की अरुचि किसी से छिपी नहीं। चूंकि संप्रग सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में वाम दलों के दबाव से मुक्त है इसलिए यह आशा की जा सकती है कि जिन सुधारों का भरोसा दिलाया जा रहा है वे वाकई आगे बढ़ सकेंगे।
आर्थिक सर्वेक्षण से यह स्पष्ट है कि सरकार देश को विश्व बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यह प्रतिबद्धता तभी फलदायक सिद्ध होगी जब ऐसे कानूनी सुधार भी हों जो आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक हो गए हैं। आर्थिक सर्वेक्षण यह बताता है कि संप्रग सरकार धीरे-धीरे निजीकरण की राह पर आगे बढ़ने जा रही है। विनिवेश की प्रक्रिया को फिर से आरंभ करना इस बात का संकेत है कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी भूमिका सीमित करना चाहती है। जिन सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश किया जाना है उनमें प्रति वर्ष 25 हजार करोड़ रुपये एकत्र करने का लक्ष्य रखा गया है। स्पष्ट है कि सरकार का दृष्टिकोण यह है कि सामाजिक ढांचे को मजबूत तभी किया जा सकता है जब आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ स्थिति में हो।
अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए संप्रग सरकार को अनेक मोर्चो पर जुटना होगा। ढांचागत विकास, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, वित्तीय सेवाओं और बाजार में उदारीकरण और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन वे क्षेत्र हैं जिनमें सराकर को एक नई सोच के तहत कार्य करना होगा। इसके साथ ही उन श्रम सुधारों पर अमल की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए जो अब तक वाम दलों के दबाव के कारण रुके पड़े थे। आर्थिक सर्वेक्षण ने श्रमिकों को यह संकेत दे दिया कि संप्रग सरकार निजी क्षेत्र को छंटनी का अधिकार देने के लिए तैयार है। यह अचरज की बात है कि भारत में अपार मानव संसाधन की उपस्थिति के बावजूद उद्योगों की कार्यकुशलता अथवा उत्पादकता विश्व स्तरीय नहीं है। उत्पादकता के इस अभाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि यह सोचा जा रहा है कि निजी क्षेत्र को श्रमिकों की छंटनी का अधिकार दे देने से उत्पादकता बढ़ जाएगी तो यह सही नहीं। इस पहल से निजी क्षेत्र को श्रमिकों के आचरण को सुधारने में तो मदद मिल सकती है, लेकिन यदि वास्तव में उत्पादकता का स्तर ऊंचा उठाना है तो उद्योगों को नई तकनीक अपनाने के साथ एक नए दृष्टिकोण का भी परिचय देना होगा।
भारतीय कंपनियों की कार्यकुशलता का एक ताजा उदाहरण मुंबई में वर्ली और बांद्रा को जोड़ने वाले पुल का है। इस उपलब्धि पर हम अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, लेकिन यथार्थ यह है कि इस तरह के पुल पश्चिमी देशों अथवा चीन में आधे समय में ही बनकर तैयार हो जाते हैं। इस पर गौर करने की जरूरत है कि भारतीय कंपनियों में कार्यकुशलता और उत्पादकता का अपेक्षित स्तर प्राप्त नहीं किया जा पा रहा है। यह हैरत की बात है कि इस संदर्भ में छिटपुट प्रयासों से ही यह आशा की जाने लगती है कि अब सब कुछ दुरुस्त हो जाएगा। जब तक सार्वजनिक अथवा निजी क्षेत्र में शीर्ष पर बैठे अधिकारी अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों के प्रति सजग-सक्रिय नहीं होंगे तब तक कार्यकुशलता की कसौटी पूरी नहीं होगी। सरकार श्रम सुधारों के साथ जिस तरह इन अधिकारियों के हाथ मजबूत कर रही है उसी तरह उन्हें भी आगे आकर उत्पादकता और कार्यकुशलता के नए आयाम स्थापित करने चाहिए।
संप्रग और खासकर कांग्रेस की ओर से पिछले कुछ समय से भारत निर्माण का नारा सुनने को मिल रहा है। यदि भारत निर्माण को नारे से आगे बढ़ाकर यथार्थ के धरातल पर उतारना है तो उन सुधारों पर यथाशीघ्र अमल किया जाना चाहिए जिन्हें आर्थिक सर्वेक्षण में सामने रखा गया है और जिनके आधार पर यह अपेक्षा की जा रही है कि इस बार के आम बजट में भी सुधारों का एजेंडा सामने आएगा। इस तरह के कार्यक्रम को पूरा करना तो एक चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार करने के साथ ही शासन तंत्र और राजनीतिक वर्ग को इस पर भी विचार करना चाहिए कि क्या केवल आर्थिक प्रगति सामाजिक समस्याओं का समाधान कर सकती है? आर्थिक सुधार के कार्यक्रम विकास दर को गति प्रदान कर सकते हैं और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कुछ उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं, लेकिन सामाजिक स्तर को सुधारने के लिए तो और भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
यह निराशाजनक है कि पिछले कुछ दिनों में मानव संसाधन विकास मंत्री की ओर से शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव के जो संकेत दिए जा रहे थे उनसे संप्रग सरकार ही कतराती नजर आ रही है। लगता है कि कपिल सिब्बल के सुधार कार्यक्रम सरकार में शामिल लोगों को इसलिए रास नहींआ रहे हों, क्योंकि अनेक निजी कालेज कांग्रेस के नेताओं द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं। चूंकि अनेक महत्वपूर्ण मामलों में संकीर्ण स्वार्थ भारी पड़ने लगते हैं और कथित राजनीतिक मजबूरियों का नाम देकर उन्हें ढाल बना लिया जाता है इसलिए वे समस्याएं भी सुलझने का नाम नहीं ले रहीं जिनके लिए बहुत मामूली इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। राजनीतिक दलों की ओर से अनेक बार दूरगामी दृष्टिकोण पेश किए जाते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद यह सामने आता है कि तात्कालिक स्वार्थो ने सुधारों की गाड़ी के पहिए थाम दिए। अगर रेल बजट को ही ले लिया जाए तो वह आर्थिक सर्वेक्षण के पैमाने पर बिल्कुल भी खरा नहीं उतरता। इस बजट में कुछ सामान्य सुधार करके विकास की बातें भले कर ली जाएं, लेकिन भारतीय रेल अपनी पुरानी पद्धतियों पर चलते हुए ही देश को इक्कीसवीं सदी में नहीं ले जा सकती। वास्तव में किसी भी क्षेत्र में तब तक किसी बुनियादी बदलाव की आशा नहीं की जा सकती जब तक देश के राजनीतिज्ञ अपने आचरण और कार्यशैली से यह प्रदर्शित न करें कि वे सुधारों के प्रति वास्तव में प्रतिबद्ध हैं।
यह निराशाजनक है कि किसी भी तरह के सुधारों को लेकर जैसा रवैया राजनीतिज्ञों का है वैसा ही नौकरशाहों का भी है। जब प्रशासनिक तंत्र का भारी-भरकम आकार भी छोटी-मोटी समस्याओं को न सुलझा पा रहा हो तो उसकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह उचित नहीं होगा कि आर्थिक सर्वेक्षण की तर्ज पर उन चुनौतियों और समस्याओं का भी खाका पेश किया जाए जो अर्थव्यवस्था के दायरे से बाहर हैं और शासन-प्रशासन की असफलता को रेखांकित करती हैं? आखिर राजनीतिक तंत्र अथवा नौकरशाही में सुधार की जरूरत की कैसे अनदेखी की जा सकती है-खासकर यह देखते हुए कि देश की अधिकांश समस्याएं कहीं न कहीं इनसे ही जुड़ी हुई हैं?
[अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए ठोस उपायों की अपेक्षा कर रहे हैं संजय गुप्त]