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चीन की गैरजरूरी चिंता

Jul 04, 11:28 pm
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1962 में चीन के खिलाफ सैन्य पराजय भारत के लिए एक कष्टप्रद घटना थी और यह पराजय इसलिए हुई, क्योंकि चौथी डिवीजन का कमांडर नाजुक मौके पर अपने स्नायु तंत्र पर काबू नहीं रख सका और उसने पीछे हटने का जो आदेश दिया वह भारतीय सेनाओं के शिकस्त खाने का कारण बन गया। भारत का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व किसी बड़े युद्ध के मामले में उस समय अनुभवहीन था। इस पराजय के बाद तथ्यों को स्वीकार करने और सेना के मनोबल को फिर से कायम करने के बजाय चीन की शक्ति तथा सैनिकों और सामग्री के मामले में उसकी श्रेष्ठता के मिथक प्रचारित किए गए। कुल मिलाकर हमारे राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में एक प्रकार के भय को विकसित हो जाने दिया गया। सैन्य रूप से सीमा पर तेजी से ढांचागत विकास की जरूरत और स्थायी रूप से सैनिकों को तैनात करने की वकालत करने के स्थान पर दोनों ही मोर्चों पर अनाश्यक सतर्कता बरती गई।

सेना के मनोबल को एक हद तक फिर से स्थापित करने का मौका तब मिला जब भारतीय सेनाओं ने 1967 में सिक्किम में चीन की सेनाओं का अपने दम पर सामना किया। फिर एक और सही कदम जनरल सुंदरजी ने सुमदोरोंगचू में सेनाओं को तैनात कर उठाया। इस सबके बावजूद कूटनीतिज्ञों, राजनीतिज्ञों और अर्थशास्त्रियों के मन से चीन का भय पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका। आज चीन को आर्थिक और सैन्य रूप से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताकत समझा जाता है। यह बिना शक सत्य भी है और यह भी सही है कि इस स्थिति में अगले कुछ दशकों तक बदलाव नहीं आना। चीन तेजी से विकसित हो रही शक्ति है। वह एक रणनीति के तहत भारत के इर्द-गिर्द के देशों को हथियार, आर्थिक मदद और सैन्य उपकरण उपलब्ध कराता रहा है। बीजिंग की योजना अपनी नौसेना को भारतीय समुद्री क्षेत्र में अधिक से अधिक तैनात करना है। हाल के वर्षों में एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव यह सामने आया है कि चीन और अमेरिका एक-दूसरे के सहयोगी के रूप में बर्ताव कर रहे हैं। आर्थिक मंदी के दौर में अपने आपसी हितों को सुरक्षित करने के लिए दोनों देशों ने सहयोग के संकेत भी दिए। आधिकारिक रूप से न सही, लेकिन जी-2 मंच की चर्चा भी हो रही है। अमेरिका के साथ सहयोग के कारण भी भारत के कुछ क्षेत्रों में बीजिंग को लेकर आशंकाएं गहराई हैं।

हमारे समक्ष सवाल यह है कि क्या हमें चीन के साथ सीमा पर सैन्य संघर्ष को लेकर भयभीत और चिंतित होना चाहिए? इसका उत्तर तलाशने के लिए थोड़ा गहराई से सोचना होगा। 2009 कदापि 1962 नहीं है। यह तय है कि भारत को अब उस ढंग की सैन्य असफलता का सामना नहींकरना पड़ेगा। चीन भारत की आजादी के बाद 62 वर्षों से अरुणाचल प्रदेश की सीमा की हकीकत स्वीकार कर रहा है-भले ही वह गाहे-बगाहे विवाद खड़े करने की कोशिश करता हो। इसके अनेक दशकों और शताब्दियों से पहले तक वह तिब्बत के यथार्थ को भी स्वीकार करता रहा है। इसके अतिरिक्त उसने अलग ताइवान के साथ रहना भी सीख लिया है। लिहाजा यह नहीं लगता कि चीन अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र के लिए भारत के साथ युद्ध छेड़ेगा। माओ दुंग और चीनी नेतृत्व ने बड़ी चालाकी से क्यूबा के मिसाइल संकट का इस्तेमाल कर भारत पर हमला बोल दिया था-बिना इसकी चिंता किए कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन के इस दुस्साहस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा? उस समय चीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पूरी तरह अलग-थलग था, इसलिए उसे अपने व्यापार और दूसरे देशों के साथ संबंधों पर युद्ध छेड़ने के दुष्परिणामों की चिंता नहीं थी। भारत में यदि यह बात समझ ली जाए तो चीन को लेकर जो आशंका और भय है वह एक हद तक स्वत: दूर हो जाएगा। चीन की ऊर्जा की आपूर्ति को लेकर भारतीय समुद्री क्षेत्र पर निर्भरता तथा तिब्बत के विकास पर आंच आने की आशंका को देखते हुए बीजिंग सीमा पर युद्ध छेड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता।

फिर चीन क्यों अरुणाचल प्रदेश के आसपास नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर भारत को चिढ़ाने का काम करता रहता है? चीन यद्यपि कई मामलों में भारत से आगे है, लेकिन चीन के लोग यह सोचते हैं कि अमेरिका भारत का इस्तेमाल उनके देश का प्रभाव कम करने के लिए कर रहा है। इसके पहले चीन यही काम पाकिस्तान के साथ कर चुका है। उसने जानबूझकर पाकिस्तान को हथियार और यहां तक कि मिसाइलें और नाभिकीय बम और उपलब्ध कराए। नब्बे के दशक से भारत की तीव्र प्रगति ने चीन के नेतृत्व में यह भावना भर दी कि भारत एशिया में उसकी ताकत को संतुलित करने के लिए उभर रहा है। इस चिंता को अमेरिका में जार्ज बुश के कार्यकाल में बल मिला, क्योंकि वाशिंगटन ने सार्वजनिक रूप से भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का ऐलान किया। इन स्थितियों में ही चीन ने मनमोहन सिंह के खिलाफ आंतरिक विरोध को हवा देने तथा सीमा पर असहज स्थिति पैदा करने की कोशिश की।

आज भारत चीन समेत प्रमुख देशों के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में ऐसी कोई आशंका आधारहीन ही कही जाएगी कि उनके बीच युद्ध छिड़ सकता है। वैसे भी चीन की अनेक कमजोरियां हैं और उसे यह भी पता होगा कि पाकिस्तान ने कारगिल में जब घुसपैठ की थी तो उसका क्या हश्र हुआ था? यदि चीन ने अरुणाचल प्रदेश में युद्ध छेड़ने का दुस्साहस किया तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। फिर भी इसका यह मतलब नहीं कि भारत अपनी सेनाओं को मजबूत करने की जरूरत न समझे। चीन नि:संदेह एशिया में अगले कुछ दशकों में अग्रणी शक्ति होगा, लेकिन अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, रूस और भारत के रूप में अंतरराष्ट्रीय शक्ति समीकरणों को देखते हुए यह तय है कि वह मनमानी करने की स्थिति में नहीं होगा।

[के. सुब्रहमण्यम: लेखक सामरिक एवं विदेश मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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