वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी जब संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करेंगे तो लोगों को उनसे आयकर का बोझ कम करने की अपेक्षा होगी। वित्तमंत्री के समक्ष एक ओर देश के बहुमुखी औद्योगिक, आर्थिक विकास की चुनौती है वहीं दूसरी ओर उन्हें विश्वव्यापी मंदी और बढ़ती महंगाई से निपटने के प्रबंध भी करने होंगे। कालेधन की समानांतर आर्थिक व्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए भी उन्हें कुछ न कुछ करना होगा। आम करदाताओं को अनेक प्रकार की कानूनी विसंगति का सामना करना पड़ता है। इन्हें दूर करने के लिए साहसिक पहल की जरूरत है। वित्त मंत्री को बचत व निवेश में कर छूट को बढ़ावा देना होगा। हालांकि गत वर्ष के चुनावी बजट में सरकार ने कर मुक्त धनराशि की सीमा में बढ़ोत्तरी व कर की स्लैब दरों में कमी करके राहत का अहसास कराया था, किंतु यह पर्याप्त नहीं है। पुरुष आयकरदाता की कर मुक्त धनराशि सीमा डेढ़ लाख से बढ़ाकर दो लाख तथा महिला करदाता की कर मुक्त सीमा एक लाख अस्सी हजार से बढ़ाकर ढाई लाख और वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह राशि तीन लाख करने की जरूरत है। वर्तमान मूल्य सूचकांक, महंगाई और रुपये की घटती क्रयक्षमता के चलते यह बेहद आवश्यक है कि लोगों को कर बोझ से राहत प्रदान की जाए।
आयकर कानून की 'धारा 80-सी' के तहत वर्तमान समय में सकल कुल आय से कटौती की छूट के लिए अधिकतम एक लाख धनराशि सीमा का प्रतिबंध लागू है। इस धारा के तहत निवेश व बचतों में धनराशि सीमा को प्रतिबंधित करना उचित नहीं है। अपनी आवश्यकता और सुविधानुसार जो जितना निवेश कर सकता है उसे सकल कुल आय पर कटौती की छूट मिलनी चाहिए। देश के आम नागरिक एवं मध्यम आय वर्गीय करदाता भारतीय सनातन संस्कृति के तहत मिलजुल कर परिवार में साथ रहते है। पूरे परिवार के भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, शादी व रोजगार तथा बीमारी की जिम्मेदारी मुखिया की होती है। कर छूट की चाहत व भविष्य के लिए बचत के कारण सरकार को भी अधिक धनराशि उद्योगों व व्यापार के विकास के लिए उपलब्ध होने लगेगी। नौकरीपेशा वर्ग को गत वर्षो में उपलब्ध मानक कटौती की छूट बहाल की जानी चाहिए। कारोबारी एवं पेशेवर करदाताओं को भी अपनी सकल कुल आय से व्यापारिक खर्चो की छूट उपलब्ध है। एचआरए की कर मुक्त धनराशि 'धारा-10 ' और गैर नौकरीपेशा व्यक्तियों को आवासीय किराया भुगतान की सकल कुल आय से कटौती छूट 'धारा-80- जीजी' के तहत छूट का आधार वास्तविक रूप से भुगतान किए गए किराए की धनराशि पर आधारित होना चाहिए। कर्मचारियों को वेतन के अलावा मिलने वाली अन्य सुविधाओं के मूल्य की गणना कर उसे कर योग्य आय में शामिल करना सही नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के लाभ संस्थान अपने कर्मियों की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए प्रदान करते है। नगद धनराशि न मिलने के बावजूद भी उस पर उन्हे आयकर अदा करना पड़ रहा है। प्रोपराइटरशिप फर्मो की तर्ज पर साझेदारी फर्मो को भी फ्रिंज बेनिफिट टैक्स से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। यदि ऐसा न किया जा सके तो निर्धारित खर्चो पर कर वसूली के लिए कर मुक्त धनराशि सीमा का निर्धारण तो अवश्य कर देना चाहिए। देश के मध्यमआयवर्गीय कारोबारी करदाताओं के संदर्भ में कानूनों में व्याप्त विसंगतियों को इस बजट में अवश्य दूर करना होगा।
'धारा-40-ए ' के तहत बीस हजार से अधिक धनराशि नगद खर्च या खरीद के मद में भुगतान नहीं की जा सकती। कानून की 'धारा-269-एसएस' तथा '269-टी' के तहत किसी भी व्यक्ति या संस्थान से एडवांस, लोन या डिपाजिट के रूप में बीस हजार से अधिक धनराशि हो जाने पर न तो नगद स्वीकार की जा सकती है और न ही इसका वापसी भुगतान नगद किया जा सकता है। ऐसे सभी लेन-देन व खर्च एकाउंट पेई चेक या बैंकर्स चेक के माध्यम से ही किए जा सकते है। खर्च के मामले में ऐसा खर्च अमान्य कर दिया जाएगा। लेन-देन के मामले में उसी धनराशि के बराबर अर्थदंड आयकर विभाग आरोपित कर सकता है। इन दोनों मामलों में वर्तमान धनराशि सीमा महंगाई व मूल्य सूचकांक को देखते हुए काफी कम है! इसे बीस हजार से बढ़ाकर कम से कम एक लाख कर दिया जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि अपरिहार्य व उचित परिस्थितियों में नगद भुगतान की छूट की व्यवस्था की जानी चाहिए। टैक्स आडिट की धनराशि सीमा भी विक्रयधन के मामले में दो करोड़ और सकल प्राप्तियों के मामले में पचास लाख कर दी जानी चाहिए।
[संतोष कुमार गुप्ता: लेखक आयकर मामलों के विशेषज्ञ हैं]