परमाणु हथियारों पर संशय

1998 में थर्मोन्यूक्लियर बम के परीक्षण को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सफलता का प्रमाणपत्र तो दे दिया है, लेकिन इससे इस मुद्दे पर छिड़ा विवाद शायद ही ठंडा पड़े। इसका कारण यह है कि परीक्षण के समय विपक्ष में रहे मनमोहन सिंह ने परमाणु विरोधी मनोभावों को नहीं छिपाया था। वास्तव में, उन्होंने चेतावनी दी थी कि इस परीक्षण का देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, लेकिन तब से सात वर्ष के भीतर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पांच गुना बढ़ चुका है और सकल घरेलू उत्पाद दर में तीव्र वृद्धि हुई है। क्या कोई बता सकता है कि 1998 से पहले किसने भारत को उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा था?

यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का प्रमाणपत्र भी थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण पर सवालिया निशान लगने से नहीं रोक पाया। भारत-अमेरिका परमाणु करार से लेकर हाइड्रोजन बम तक पर कलाम ने हमेशा आधिकारिक दावों की ही पुष्टि की है, किंतु जिस मिसाइल कार्यक्रम का उन्होंने लंबे सयम तक संचालन किया वह अभी तक लक्ष्य तक नहीं पहुंचा है। कलाम भारत को आधारभूत मिसाइल क्षमता से लैस नहीं कर पाए। भारत का परमाणु सामरिक कार्यक्रम हमेशा संसदीय जांच और कैग के परीक्षण से मुक्त रखा गया है। इसलिए निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल है कि भारत का एकमात्र थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण विफल हुआ या सफल, लेकिन कुछ तथ्य इसकी सफलता की चुगली कर रहे हैं।

पहला तथ्य तो यह है कि 11 साल से अधिक समय बीतने के बाद भी भारत ने अब तक थर्मोन्यूक्लियर प्रौद्योगिकी पर आधारित हथियार नहीं बनाए हैं। स्पष्ट है कि थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण केवल प्रौद्योगिकी के प्रदर्शन मात्र के लिए नहीं किया गया था इसलिए यह पूछने का सही समय है कि परीक्षण से देश की सुरक्षा को क्या फायदा हुआ? इससे भी आश्चर्यजनक यह तथ्य है कि पोखरण-1 के 35 साल से भी अधिक समय बीतने के बाद भी भारत अनिच्छुक और प्रायोगिक परमाणु शक्ति बना हुआ है। चीन के खिलाफ वह न्यूनतम प्रतिरोधक शक्ति भी हासिल नहीं कर पाया है। चीन के साथ बढ़ते सामरिक असंतुलन को देखते हुए सिद्ध और हथियारबंद थर्मोन्यूक्लियर क्षमता तथा लंबी दूरी की मिसाइलें तैयार करना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए जरूरी है, किंतु आज भारत के पास बीजिंग तक मार करने वाली एक भी मिसाइल नहीं है। अगर भारत न्यूनतम, किंतु विश्वसनीय परमाणु हथियार विकसित करने के साथ उसे तैनात कर लेता तो चीन भारत के साथ दबंगई करने की जुर्रत नहीं कर पाता। चीन की दबंगई जो हालिया सीमा उल्लंघन और सीमा विवाद पर चीन के कठोर रुख से झलकती है, इससे लगता है कि कमजोर भारत के खिलाफ उसकी हिम्मत बढ़ती जा रही है।

एक और अप्रिय तथ्य पर ध्यान दें। किसी भी देश ने न्यूनतम परमाणु क्षमता हासिल करने के लिए इतना समय नहीं लिया है और न ही इतनी भारी अंतरराष्ट्रीय कीमत चुकाई है जितनी कि भारत ने। भारत के परमाणु हथियार कार्यक्रम का इतिहास वास्तव में भारत द्वारा बहुपक्षीय प्रौद्योगिकी प्रतिबंध झेलने का रिकार्ड है। उदाहरण के लिए, पोखरण-1 ने परमाणु आपूर्ति समूह के गोपनीय गठन का काम किया। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण युग को जन्म दिया।

इससे पहले कि भारत न्यूनतम भरोसेमंद परमाणु क्षमता हासिल कर पाता, अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार करके यह वापस वहीं पहुंच गया, जहां से चला था। परमाणु करार के माध्यम से भारत ने परमाणु आपूर्ति समूह से छूट हासिल कर ली और इस प्रकार ऊंची कीमत पर वाणिज्यिक परमाणु शक्ति रिएक्टर और ईधन हासिल करने की तैयारी कर ली। इस प्रयास में भारत ने परमाणु अप्रसार की शर्तो को स्वीकार कर लिया, जिसका उद्देश्य भारत के परमाणु विकास को कुंद करना है। इस करार के माध्यम से भारत ऊर्जा क्षेत्र में वही गलती दोहराने जा रहा है, जो सामरिक क्षेत्र में की थी। हथियारों का विश्व का सबसे बड़ा आयातक भारत हथियार निर्माण में आत्मनिर्भर होने के बजाय हर साल छह अरब डालर (करीब 29,000 करोड़ रुपये) से अधिक की रकम परंपरागत हथियारों की खरीद पर खर्च करता है। इनमें से बहुत से हथियारों का मूल्य संदेह के घेरे में है। यह सही है कि परंपरागत हथियार परमाणु हथियारों की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकते। परमाणु हथियार क्षमता वाले शत्रु का प्रतिरोध परमाणु क्षमता से ही किया जा सकता है। खासतौर से प्रतिरोधक मारक क्षमता, जो शत्रु के परमाणु हथियारों से बचते हुए पलटवार कर सके। इसके अलावा, भारतीय नीति निर्माताओं को अभी तक इस बात का एहसास नहीं है कि तीन विशेषताओं के बिना कोई भी देश महाशक्ति नहीं बन सकता है। ये विशेषताएं हैं-उच्चस्तरीय स्वदेशी और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी क्षमता, बुनियादी रक्षा जरूरतों को देश में ही पूरा करना और सीमा पार दूर तक प्रहार करने की क्षमता विकसित करना, विशेष तौर पर अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल क्षमता हासिल करना।

इन तीनों ही क्षेत्रों में भारत आत्मनिर्भर नहीं है। यह कोई हादसा नहीं है कि अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (आईसीबीएम) से लैस तमाम देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। आईसीबीएम कार्यक्रम के जरिये तकनीकी छलांग लगाने के बजाय भारत अंतरदेशीय बैलिस्टिक मिसाइल चरण पर अटका हुआ है। वास्तव में, 1991-95 के दौरान वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने पैसे की तंगी पैदा कर परमाणु कार्यक्रम के विस्तार को रोक दिया था। 2008-09 के बजट में सरकार ने परमाणु ऊर्जा विभाग के मद में 52 करोड़ डालर की कटौती कर दी। इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। परमाणु करार के तहत सरकार स्वत: ही इस बात के लिए राजी हो गई कि वह देश के दो प्लूटोनियम उत्पादक रिएक्टरों में से एक को अगले साल तक बंद कर देगी, जबकि परमाणु हथियारों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के संबंध में भारत की स्थिति पाकिस्तान से थोड़ी ही बेहतर है।

पोखरण-2 के एक दशक से भी अधिक समय बीतने के बाद भारत के पास जश्न मनाने के अधिक अवसर नहीं हैं। परमाणु हथियारों को लेकर आत्मसंशय हालात को और बिगाड़ रहा है। चीन और भारत के बीच शक्ति असंतुलन इतना व्यापक हो गया है कि भारत के बहुत से नीति निर्धारकों का भरोसा डगमगा गया है कि हम अपने बूते देश की रक्षा करने में सक्षम हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में, हाल ही में किए गए इस दावे कि थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण कसौटी पर पूरी तरह से खरा नहीं उतरा था, से भारत की परमाणु क्षमता की साख में गिरावट ही आई है। हालांकि थर्मोन्यूक्लियर परीक्षण पर विवाद नया नहीं है। परीक्षण के तुरंत बाद भारतीय परमाणु कार्यक्रम के पूर्व मुखिया पीके अयंगर ने इसकी सफलता के दावों पर सवाल खड़े किए थे। इस प्रकार की स्थिति में जब देश के भीतर और बाहर आलोचक परीक्षण की सफलता पर संदेह जता रहे हैं, भारत को फिर से अपनी थर्मोन्यूक्लियर क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए। शायद इससे अनुकूल अंतरराष्ट्रीय अवसर हाथ आ जाए। परमाणु क्षमता ऐसी खूबसूरती की तरह है, जो आंखों में नजर आती है। भारत के परमाणु प्रतिष्ठान के दावे नहीं, बल्कि बाहरी विशेषज्ञों की राय मायने रखती है कि भारत परमाणु निवारक क्षमता हासिल कर चुका है या नहीं।

[ब्रह्मा चेलानी: लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]




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