पिछले साल नवंबर में जब बराक ओबामा ने राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला था तब अमेरिका स्वास्थ्य, इराक युद्ध, अफगानिस्तान युद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी जैसी गंभीर समस्याओं में उलझा हुआ था। ओबामा ने सभी समस्याओं को नए सिरे से पकड़ा और इनका समाधान निकालने का प्रयास किया। जैसा कि अपेक्षित था, राष्ट्रपति ओबामा ने अपने राजनीतिक विरोधियों को हैरान करते हुए उन्हें ढेर सारा मसाला दे दिया है। उन्होंने विफलता के कगार पर पहुंच चुके अमेरिकी आटो उद्योग को मंदी की गिरफ्त से उबार लिया। तेल बचाने के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए। चुनाव के दौरान जनता से किए गए वायदों को पूरा करने की दिशा में भी वह आगे बढ़ रहे हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य योजना ओबामा प्रशासन के लिए सचमुच एक गंभीर चुनौती थी। इनमें एक बड़ा मुद्दा गर्भपात को लेकर था। गर्भपात के विरोधी कैथोलिक अस्पतालों ने महसूस किया कि यदि अमेरिकी स्वास्थ्य सेवाओं की नीतियों को दुरुस्त किया गया तो वे गर्भपात सेवा देने के लिए बाध्य कर दिए जाएंगे, जबकि औसत अमेरिकियों को तुरंत स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की अपेक्षा है। औषधि निर्माता कंपनी फायज के नए सौदे ने विश्व स्तरीय दवा कंपनियों के ऊपर मंडराते खतरे से आगाह कर दिया। ओबामा ने अन्य विकसित देशों से दवाओं के आयात में मूल्यों को कम करने, स्वास्थ्य योजनाओं में जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ाने तथा दवा कंपनियों से बाजार में सस्ती जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति पर जोर दिया। ओबामा के इन स्वास्थ्य सुधारों से बड़ी दवा कंपनियों के संचालक मंडलों में सिहरन फैल सकती है।
हाल ही में किए गए जनसर्वेक्षण में बराक ओबामा की लोकप्रियता व निर्णय लेने की क्षमता की औसत गिरावट रुक चुकी है। यह आंकड़ा 50 फीसदी के निम्न स्तर से ऊपर उठा है। यह औसत रोनाल्ड रीगन व बिल क्लिंटन के औसत के बराबर है। संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अपने पहले संबोधन से ओबामा कूटनीतिक विश्व के शीर्षस्थ पायदान पर पहुंच गए। यहां उन्होंने दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर सफलता हासिल की। पहला ईरान को दिए जा रहे भारी पैकेज पर पुनर्विचार करने के लिए रूस को मनाना व दूसरा परमाणु शस्त्रों की कटौती व नियंत्रण के लिए रूस व चीन को राजी करना। ओबामा ने दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की दिशा में भी बात आगे बढ़ाई। राष्ट्रपति ओबामा ने विश्व के सामने एक सभ्य व सुसंस्कृत अमेरिका की छवि को पेश किया, जो सबसे बेहतर रिश्ते बनाना चाहता है। पिछले अन्य सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों के विपरीत ओबामा की भाषा में विनम्रता है। ओबामा ने इजरायल व फलस्तीन को सलाह दी कि वे मिल कर इजरायल और अरब देशों के बीच शांति समझौते को साकार करे। वास्तव में, यह ओबामा के लिए एक बड़ी चुनौती है।
इससे भी बड़ी चुनौती है अफगानिस्तान। यदि ओबामा अफगानिस्तान युद्ध को जारी रखते हैं तो उनकी लोकप्रियता गिर जाएगी। वह बड़ी गंभीरता से अफगानिस्तान की गुत्थी सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। अमेरिकी चाहते हैं कि उनके नेता युद्धों में उलझने के बजाय अमेरिका को आर्थिक मंदी से उबारने पर ध्यान केंद्रित करें। इराक में एक लंबे, दु:खद अनुभव के बाद और भयावह आर्थिक मंदी के विषाद से गुजरने के बाद अमेरिकी अब कोई युद्ध नहीं चाहते। ओबामा अमेरिका में शिक्षा के स्तर को लेकर खासे चिंतित है। वह सरकारी अनुदान द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता को उच्च स्तर तक ले जाने को कृत संकल्प है। वह कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों को पुरस्कृत और लापरवाह शिक्षकों को दंडित करना चाहते हैं। कुल मिलाकर ओबामा अमेरिका में शिक्षा के चरमराते ढांचे को दुरुस्त करना चाहते हैं। ओबामा की प्राथमिकता सूची में कुछ और भी गंभीर मुद्दे है, जैसे मौसम में बदलाव, तेल को मिलने वाली सरकारी रियायत, सुरक्षा, ईरान का परमाणु कार्यक्रम, उत्तर कोरिया की मनमानी आदि। जिस संकल्प व समर्पण से ओबामा इन सबका हल निकालने में जुटे है, विश्व को उम्मीद है कि जल्द ही वह अपने उद्देश्य में कामयाब हो जाएंगे। ओबामा ने स्वीकार किया कि विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बराक ओबामा ने विश्व मंच पर भारत की बढ़ती आर्थिक हैसियत को एक तरह से स्वीकृति ही दी। भारत और अमेरिका में कुछ मतभेद जरूर है, लेकिन ये इतने गंभीर नहीं हैं कि हल न हो सकें। ओबामा के 'अमेरिकी प्रथम' के फैसले से अप्रवासी भारतीयों पर नकारात्मक असर पड़ा है। फिर भी भारतीय ओबामा से खुश हैं। वे उम्मीद कर रहे है कि ओबामा विश्व में शांति और समृद्धि लेकर आएंगे तथा संकटकाल में भारत का साथ देंगे।
[उमा श्रीराम: लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]