
सुप्रीमकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन मानते हैं कि न्यायपालिका की गरिमा घटी है और अब उसके अधिकार भी जा रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है और कोलिजियम व्यवस्था असफल हो गई है। नियुक्तियों में पक्षपात व दुराग्रह होता है। न्यायपालिका में प्रशासनिक अनुभव की कमी को आधार बनाते हुए वह जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार को शामिल करने की बात भी कहते हैं। उनका यहां तक कहना है कि जनता मानने लगी है कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ बड़े लोगों की अदालत है। न्यायपालिका पर उठती उंगलियों और सरकार के न्यायिक सुधार एजेंडे पर धवन ने दैनिक जागरण की प्रधान संवाददाता माला दीक्षित के साथ साक्षात्कार में बेबाक बातचीत की। पेश हैं साक्षात्कार प्रमुख अंश-
क्या भ्रष्टाचार की वजह न्यायिक तंत्र की अक्षमता है?
भ्रष्टाचार हमारे सिस्टम आफ गवर्नेंस में है। न्यायपालिका से लेकर नौकरशाही में भ्रष्टाचार व्याप्त है। भारत में भ्रष्टाचार रोकना न्यायपालिका के वश की बात नहीं है, उसके और भी जरिये हैं। रही बात न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की तो इसे दूर करने की कानून में दो स्तरीय व्यवस्था दी गई है। एक हाईकोर्ट और निचली अदालतें, दूसरा हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट। निचली अदालतों में भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी हाईकोर्ट की है जिसमें वे सफल नहीं हुए हैं। गाजियाबाद के पीएफ घोटाले को देखकर तो ऐसा ही लगता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में भी भ्रष्टाचार है। उसे दूर करने में सुप्रीम कोर्ट असफल रहा है। पंजाब एवं हरियाणा तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय और दिनकरण का केस उदाहरण है। कारण नियुक्ति और प्रशासन में जजों की अपनी प्राथमिकताएं और पूर्वाग्रह हैं।
क्या आप कहना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की कोलिजियम व्यवस्था फेल हो गई है और उसमें बदलाव की जरूरत है?
हां कोलिजियम काम नहीं कर रही है। ये कोलिजियम भी संविधान के खिलाफ थी। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नियुक्ति अधिकार अपने पक्ष में कर लिया था। कोलिजियम के निर्णय भावनात्मक होते हैं। उसके पास जांच या प्रशासन का कोई तंत्र नहीं है, जिससे वे चीजों की जांच करके पूर्ण निर्णय ले पाएं। इमरजेंसी के बाद जजों की नियुक्ति को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के लिए कोलिजियम व्यवस्था लागू की गई थी। इमरजेंसी के 32 साल बाद अब कोलिजियम का कोई जन उद्देश्य नहीं रह गया है। हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति में भी न्यायपालिका का नियंत्रण है। न्यायपालिका का स्तर गिर रहा है। निजी संबंध, जाति वर्ण और क्षेत्र का आधार हावी हो रहा है। एक ऐसी कोलिजियम होनी चाहिए जिसके पास जांच की और दंड देने की शक्ति हो, जैसा की अमेरिका और अन्य विकसित देशों में होता है। नियुक्ति के मामले में सरकार और वकील भी शामिल होने चाहिए। न्यायपालिका के मन में यह बात बैठ गई है कि अगर नियुक्ति का अधिकार उससे छिन गया तो न्यायपालिका का स्तर गिर जाएगा। स्तर तो गिर चुका है। नया सिस्टम पारदर्शी होना चाहिए।
क्या जजों के खिलाफ कार्रवाई की जटिल प्रक्रिया ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया है?
भारत में ज्यादातर ताकतवर लोगों के खिलाफ कार्रवाई असफल रहती है। दंड कमजोर को मिलता है। न्यायपालिका बहुत ताकतवर है। उसने अपने संरक्षण की जो प्रक्रिया बनाई है उसमें पारदर्शिता नहीं है। लोगों को विश्वास नहीं है कि वह अपने खिलाफ कार्रवाई करेगी।
क्या आप मानते हैं कि इन पर कार्रवाई के लिए महाभियोग के अलावा दूसरे भी तरीके होने चाहिए?
एक जांच आयोग बनाया जाना चाहिए, जो महाभियोग के पहले प्रतिबंध लगा सके और चेतावनी दे सके। जब तक ऐसा नहीं होगा और जज अपनी गलती नहीं मानेंगे तब तक वे महाभियोग की प्रक्रिया के पीछे छिपे रहेंगे। आरोपी जज को स्थानांतरित करने से कुछ नहीं होगा। कुछ और तरीके होने चाहिए, जैसे कि अमेरिका में शिकायत प्रणाली है। जजों की ये आशंका निर्मूल है कि इससे फर्जी शिकायतें आयेंगी। इस प्रक्रिया से एक रोक तो लगेगी।
जजों की जवाबदेही तय करने के लिए कानून लाया जा रहा है। नियुक्ति मामले में भी सरकार कोलिजियम को सुझाव देने जा रही है। क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता नहीं प्रभावित होगी।
जजों के फैसले करने की स्वतंत्रता सरकार कभी नहीं छीन सकती, लेकिन नियुक्ति और प्रशासन के कामों में न्यायपालिका को अनुभव नहीं होता है। हमारे यहां मुख्य न्यायाधीश अतिरिक्त समय में ये काम करते हैं। अतिरिक्त समय में प्रबंधन से न्यायपालिका सफल नहीं होगी। उसे आशंकाओं को छोड़ बदलाव का स्वागत करना चाहिए।
क्या माओवाद पनपने का एक कारण आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया की असफलता या देरी भी है? क्या यह भी माना जाए कि लोगों का न्यायपालिका से विश्वास टूट रहा है?
नक्सल समस्या एक सामाजिक समस्या है, जो राजनीतिक असफलता के कारण बढ़ गई है। यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट पहले गरीबों, आदिवासियों की समस्या हल करने की कोशिश करता था, लेकिन पिछले दस बीस-वर्ष में उसकी रणनीति बदल कर व्यापार विकास को संरक्षित करने की हो गई है। वन संरक्षण का सिर्फ दिखावा हो रहा है। 1997 में समता मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासियों को संरक्षण देने की कोशिश की थी, लेकिन तीन साल बाद बाल्को फैसले में विपरीत रुख नजर आया। आदिवासियों के संरक्षण लिए कोई खास सिद्धांत आगे नहीं बढ़ते दिख रहे। लोगों के मन में यह बात बैठ गई है कि न्यायपालिका गरीबों को न्याय नहींदे पा रही है।
न्यायपालिका स्वयं को सुधारने में असफल रही है, क्या इसीलिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है?
न्यायपालिका के पास संसाधनों और पैसे की कमी है। उसके पास वित्तीय अधिकार नहीं हैं। उन्हें सुविधाओं और धन के लिए कार्यपालिका के सामने हाथ फैलाने पड़ते हैं। अस्सी के दशक में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र ने तो याचिका दाखिल कर एक तरह से धमकी दे दी थी कि अगर संसाधन नहीं मिले तो हाईकोर्ट कोर्ट फीस से आने वाले धन को रख लेगा। निचली अदालत के जजों को उतनी सुविधाएं और सम्मान नहीं मिलता जितना नौकरशाही को मिलता है।
सरकार के न्यायिक सुधार के एजेंडे पर आपका क्या कहना है?
नई नीति समग्र नहीं है। एक ऐसी नीति की जरूरत थी जो तदर्थ न हो। अभी जो एजेंडा सरकार ने पेश किया है वह एक तरह से लोड शेडिंग का है। वैसे भी नीति लागू करना बड़ी चुनौती है। विजन दस्तावेज में संख्या की बात की गई है, गुणवत्ता की बात नहीं है। सफल देशों में कोर्ट का प्रबंधन विशेषज्ञ करते हैं, जबकि भारत में मुख्य न्यायाधीश। न्यायपालिका के पास प्रबंधन का अनुभव नहीं होता, इसके लिए विशेषज्ञ होने चाहिए।
कहा जा रहा है कि न्यायपालिका में कामर्शियल केस निपटाने की क्षमता नहीं है।
कामर्शियल मामले इतने जटिल नहीं होते जितने बनाए जाते हैं। इनकी सुनवाई में समय लगता है। कामर्शियल मामले मधंयस्थता के जरिये सुलझाए जाने चाहिए और सुप्रीम कोर्ट को मध्यस्थता के फैसले में दखल नहीं देना चाहिए। जो पक्ष हार जाता है वह मुकदमा लड़ता रहता है इसीलिए विवाद जल्दी समाप्त नहीं होता।
[न्यायपालिका के कामकाज पर जागरण के सवालों के जवाब दे रहे हैं वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन]